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इलाहाबाद में शास्त्री ने संभाली थी ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की कमान

Mon, 11 Jan 2016 12:04 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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 ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा देने वाले देश केदूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के लिए जनता और देश के विकास से बढ़कर कुछ नहीं था। वह एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जिनके लिए देश को आजाद कराना एक जुनून था। उनके जीवन और व्यक्तित्व के हर एक पहलू से युवाओं को हमेशा प्रेरणा मिली है।
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वैसे कम ही लोग जानते होंगे कि इलाहाबाद में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की कमान संभालने के साथ ही शास्त्री जी ने असंगठित हो रही कांग्रेस को भी एकजुट करने का काम किया था। वर्ष 1942 में जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की तो अंग्रेजी हुकूमत ने जवाहर लाल नेहरू समेत सभी बड़े नेताआें को गिरफ्तार कर लिया। लाल बहादुर शास्त्री भी गिरफ्तार किए गए। वर्ष भर जेल में रहने के बाद अंग्रेजी हुकूमत को लगा कि शास्त्री जी शासन के लिए खतरनाक नहीं है, सो उन्हें रिहा कर दिया गया लेकिन अंग्रेजों के लिए यह भूल थी।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग के प्रो.सुशील श्रीवास्तव कहते हैं, तब कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच आपसी मतभेद काफी बढ़ गए थे। लोगों को लगा कि आंदोलन नेतृत्वविहीन हो जाएगा, ऐसे में जेल से रिहा हुए शास्त्री जी सीधे आनंद भवन पहुंचे और उन्होंने आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम किया। शास्त्री जी की पहल से सिर्फ एक सप्ताह में ही शहर में आंदोलन ऐसा तेज हुआ कि अंग्रेजी हुकूमत के होश उड़ गए और उसने आनंद भवन से उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर लिया।
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 पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इलाहाबाद के मेजा तहसील के उरुवा बाग में ही जय जवान जय किसान का नारा दिया था जिसने देश की तकदीर बदल दी। वह वर्ष 1957 और 1962 में यहीं से सांसद चुने गए। कटघर में किराए के मकान में रहकर उन्होंने अपना जीवन गुजारा। राजा मांडा ने उन्हें स्कूल खोलने और तकनीकी शिक्षा के लिए मांडा में ही दान में काफी जमीन दी थी। बेटियों की शिक्षा को लेकर वह हमेशा समर्पित रहे।

 चुनाव के दौरान उरुवा बाग में हुई चुनावी जनसभा में उन्होंने ‘जय जवान जय किसान’ का उद्घोष दिया तो इसका जबर्दस्त स्वागत हुआ। उनके सपने को पूरा करने के लिए बेटे सुनील शास्त्री ने मांडा में लाल बहादुर शास्त्री फाउंडेशन की स्थापना की और कई कॉलेज खोले। मांडा खास के रामबहादुर कहते हैं, शास्त्री जी सदैव कुछ नया करने की सोच रखते थे।
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