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अंग्रेजी भी जरूरी, पर सरकारी स्कूलों में पढ़ने की आस अधूरी

Thu, 07 May 2015 11:44 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला इलाहाबाद
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7 मई। रोहित ने यूपी बोर्ड के एक हिंदी माध्यम स्कूल से इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। रोहित की ख्वाहिश है कि वह सेना में अफसर बने। मां-बाप भी यही चाहते हैं। रोहित पढ़ने में तेज है, सो एनडीए की लिखित परीक्षा में उसका चयन हो गया लेकिन एसएसबी में छंट गया। कमी सिर्फ इतनी रह गई कि वह अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के बच्चों की तरफ फर्राटे से अंग्रेजी नहीं बोल पाता है। मां-बाप की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि वह मोटी फीस देकर रोहित को निजी क्षेत्र के अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ा पाते। अगर स्कूल ने शासन के सात साल पुराने आदेश का अनुपालन किया होता और अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई की व्यवस्था लागू कर दी होती तो रोहित को हताश न होना पड़ता।
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यह तो एक उदाहरण है। जिले में यूपी बोर्ड के तकरीबन एक हजार स्कूल हैं और यहां पांच लाख से अधिक बच्चे पढ़ते हैं। वहीं, निजी क्षेत्र के अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में बच्चों की संख्या इससे दस गुना कम है लेकिन बात जब नौकरी की आती है तो चयनितों में अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के विद्यार्थी ही आगे रहते हैं। समय की मांग को देखते हुए 90 के दशक में ही निजी क्षेत्र के स्कूलों ने अंग्रेजी को अपना लिया। इसके बाद निजी स्कूलों का क्रेेज तेजी से बढ़ा और मोटी फीस के बावजूद इन स्कूलों में एडमिशन के लिए लंबी कतार लगने लगी। गली-मुहल्लों में सौ-सौ कदम की दूरी पर स्कूल खुलने लगे और यह सिलसिला अब भी जारी है। निजी क्षेत्र के स्कूलों को इसका फायदा भी मिला। स्कूल न सिर्फ शिक्षा तक सीमित रह गए, बल्कि इन्होंने कारोबार का रूप ले लिया जबकि इनसे बेहतर सुविधाओं और अधिक बजट वाले यूपी बोर्ड के स्कूल ‘लकीर के फकीर’ बने रह गए। सरकारी स्कूलों के इस रुख से उन बच्चों को नुकसान उठाना पड़ रहा है, जिनके मां-बाप आर्थिक मजबूरियों के कारण चाहते हुए भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में नहीं पढ़ा पा रहे।


अभिभावक भी यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि किसी निजी कंपनी में अफसर बनना हो या होटल में वेटर का काम करना हो, फर्राटे से अंग्रेजी बोले बगैर कुछ नहीं होने वाला। यह तभी हो सकता है, जब बच्चों को स्कूल में इसका माहौल मिले। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि भविष्य में यूपी बोर्ड के स्कूलों की यही हालत रही तो, प्रतिस्पर्धा के इस दौर में ऐसे स्कूलों से निकलने वाले बच्चे क्या करेंगे और कहां जाएंगे। हालांकि सरकार कोक भी इसका एहसास हो गया था कि समय के साथ नहीं चले तो सरकारी स्कूलों का अस्तित्व बचाना मुश्किल हो जाएगा। यही वजर ही कि सात साल पहले शासन ने यूपी बोर्ड के स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम में भी पढ़ाई की व्यवस्था लागू करने का आदेश दिया लेकिन यह आदेश कागजों में ही सीमित रह गया।
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माध्यमिक शिक्षा विभाग को हर साल करोड़ों रुपये का बजट आवंटित होता है। सांसद और विधायक निधि का भी बड़ा हिस्सा स्कूलों के निर्माण और अन्य व्यवस्थाओं पर खर्च कर दिया जाता है। इसके बावजूद नतीजा सिफर है। करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद इन स्कूलों में पढ़ाई के स्तर में खास सुधार नहीं हो पा रहा। निजी स्कूलों के मुकाबले इन सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का वेतन भी काफी अधिक है लेकिन पढ़ाई की गुणवत्ता के मसले पर ये स्कूल पिछड़े हुए हैं।

‘प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पहले भी बोर्ड से मान्यता लेकर अंग्रेजी माध्यम की कुछ कक्षाएं चला करती थीं। कॅरियर की आवश्यकता और ग्लोबलाइजेशन के दौर में अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई को पब्लिक स्कूलों ने बड़ी तेजी से अपनाया। वहीं, सरकारी इंटर कॉलेजों में पढ़ाई का स्तर लगातार गिरता गया। समय की मांग को देखते हुए हर सरकारी स्कूल में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई का विकल्प होना चाहिए।’
पीएन पांडेय, पूर्व प्रधानाचार्य, यूपी बोर्ड स्कूल

‘यूपी बोर्ड के मेरिट वाले छात्र अंग्रेजी लिखने में तो आगे हैं लेकिन जब फर्राटे से बोलने की बात आती है तो जुबान लड़खड़ाने लगती है या चेहरे पर संकोच नजर आता है। यही वजह है कि जहां अंग्रेजी बोलने की बात आती है तो अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों को वरीयता मिल जाती है और पढ़ाई-लिखाई में अव्वल होने के बावजूद यूपी बोर्ड के छात्र अपना लक्ष्य पाने से चूक जाते हैं। ऐसे में परिस्थितियों के अनुसार यूपी बोर्ड के स्कूलों को भी इच्छुक विद्यार्थियों के लिए अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई का विकल्प उपलब्ध करना चाहिए।’
कृष्ण मोहन त्रिपाठी, पूर्व माध्यमिक शिक्षा निदेशक

‘अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई अब समय की जरूरत बन गई है। सरकारी स्कूलों को इसके लिए आगे आना होगा आना होगा, तभी उनके विद्यालयों का अस्तित्व बना रहेगा। शिक्षकों की चयन प्रक्रिया में बदलाव करने की भी जरूरत है। शिक्षकों के चयन में अंग्रेजी की जानकारी को अनिवार्य कर दिया जाए।’
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महेन्द्र कुमार सिंह, उप शिक्षा निदेशक माध्यमिक
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