बिहार विधानसभा के चुनाव परिणाम ने चुनावी पंडितों का गणित गड़बड़ा दिया है। कल तक बीजीपी की बंपर जीत का दावा कर रहे तमाम चुनाव विश्लेषकों को ताजा चुनाव परिणाम ने नए सिरे से मतदाताओं का मूड और लोकतंत्र का मायने जानने के लिए विवश कर दिया है। किसी का मानना है कि पुरस्कार लौटने के समर्थन और विरोध की मुहिम सहित असहिष्णुता का मुद्दा प्रभावी रहा तो कोई गाय की तस्वीर और बीफ मुद्दे को हवा देने को वजह मान रहा है। किसी का मानना है कि मोदी ने ‘वन मैन शो’ जारी रखते हुए अन्य पार्टी नेताओं को दरकिनार कर दिया तो कोई कथनी और करनी में अंतर को मुख्य वजह मान रहा है।
बिहार का परिणाम मोदी और अमित साह की पराजय है। अपनी सभाओं में बार-बार जनता को पैसे और पैकेज का प्रलोभन देने वाली बात जनता के स्वाभिमान पर चोट रही। लोगों को नागवार गुजरा कि पैसे देकर उन्हें खरीदा जा रहा है। लालू का जातिवाद कार्ड सफल रहा। मोदी या उनके लोगों की ओर से तरह-तरह से सांप्रदायिक मुद्दे भी हवा का रुख पटलने में प्रभावी रहे। बीफ का मामला बीजेपी के खिलाफ रहा। महत्वपूर्ण यह कि बीते एक वर्ष के दौरान मोदी की मुहिम या योजनाओं का सीधे तौर पर जनता को कोई लाभ नहीं मिला, जिससे लोगों को उनकी नीतियों पर शक हुआ। तमाम वायदों के बीच ‘चुकता मतदाता’ ने बीजेपी से दूर रहने का फैसला कर लिया था। मोदी का वनमैन शो उनके खिलाफ गया। अकेले उनकी जादूगरी नहीं चली। स्वच्छता अभियान पर दालरोटी सहित जमीनी हकीकत से जुड़े मुद्दे हावी रहे।
लोकसभा चुनाव में मोदी ने युवाओं को बड़े-बड़े सपने दिखाए जिसमें रोजगार देने और महंगाई कम करने के नारे खास रहे लेकिन चुनाव बाद वह इन वायदों पर खरेनहीं उतरे। तकरीबन डेढ़ वर्ष में ऐसा कोई काम नहीं दिखा जिससे लोगों को राहत मिले। कांग्रेस से जनता महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर परेशान थी, बीजेपी केशासनकाल में भी इन मुद्दों से पीछा नहीं छूटा। ऐन चुनाव के वक्त दाल की कीमतों ने सरकार के महंगाई नियंत्रण की कलई खोल दी। वहीं नीतीश के काम ने युवाओं एवं आमजन में विश्वास जगाया। लालू के अंदाज ने जनता को प्रभावित किया। असहिष्णुता नहीं लेकिन सामाजिक न्याय का मुुद्दा असरदार रहा। विपक्ष की एका से वोटों का ध्रुवीकरण हुआ।