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नियुक्ति में समता के मूल अधिकार का हनन

Sun, 18 Oct 2015 12:24 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग अध्यक्ष अनिल यादव की नियुक्ति को रद्द करने सहित हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि इसमें सरकार ने मनमानी ही नहीं की बल्कि समता के मूल अधिकार का भी हनन किया है। संविधान के अनुच्छेद 14 में उल्लिखित समता के अधिकार के मुताबिक सरकार को पक्षपात का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने माना कि अनिल यादव का चयन करते समय अन्य आवेदकों पर विचार ही न करके प्रदेश सरकार ने संवैधानिक  मर्यादाओं की सीमा का उल्लंघन किया जिससे चयन प्रक्रिया दूषित हुई और समता के मूल अधिकार का हनन भी हुआ।
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हाईकोर्ट ने फैसले में सुप्रीमकोर्ट के कई न्यायिक निर्णयों के हवाले से न सिर्फ इस मामले में अपने हस्तक्षेप अधिकारिता के प्रश्नों का उत्तर दिया है बल्कि आयोग अध्यक्ष जैसे शुचितापूर्ण पद पर नियुक्ति के मानकों को भी सामने रखा है। लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष जैसे पद के महत्व को सामने रखते हुए न्यायालय ने कहा कि ऐसे लोग जिनसे सिविल सेवा और प्रशासनिक सेवा के लिए योग्य अभ्यर्थियों के चयन की अपेक्षा है, उनको स्वयं उच्च क्षमता और उल्लेखनीय उपलब्धियों वाला होना चाहिए ताकि आम लोगों को भरोसा हो सके कि उनके द्वारा सुयोग्य लोगों का चयन किया जाएगा। यह तभी संभव है जब आयोग के अध्यक्ष और सदस्य वांछित उपलब्धि, उच्च क्षमता और ईमानदार चरित्र के होंगे। प्रदेश सरकार ने अनिल यादव का चयन करते समय इन बातों की ओर न गौर किया और न ही अन्य अभ्यर्थियों के आवेदनों पर विचार ही जो समता के अधिकार का उल्लंघन है।

0 आयोग अध्यक्ष का पद संविधान के ट्रस्टी जैसा
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पद के महत्व पर टिप्पणी करते हुए मुख्य न्यायमूर्ति डा.डीवाई चंद्रचूड की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि आयोग अध्यक्ष का पद संविधान के ट्रस्टी जैसा है। सुप्रीमकोर्ट ने भी कहा है कि आयोग का अध्यक्ष अपना दायित्व संविधान के ट्रस्टी के रूप में निर्वाह करता है। सरकार का कत्तर्व्य है कि वह इस पद पर किसी व्यक्ति की नियुक्ति करते समय उससे संबंधित सभी पक्षों, विशेषकर व्यक्ति की योग्यता, सत्यनिष्ठा, क्षमता और अनुभव जैसे तत्वों को देखा जाना चाहिए।
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0 विशेष मामलों में कोर्ट को है हस्तक्षेप का अधिकार
लोक सेवा आयोग अध्यक्ष की नियुक्ति के मामले में सामान्यत: न्यायालय के हस्तक्षेप के अधिकार सीमित हैं मगर विशेष परिस्थितियों में अदालत को नियुक्ति रद्द करने और अन्य उचित आदेश पारित करने का अधिकार है। हाईकोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 में अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर यह सुनिश्चित कर सकता है कि सरकार अपने विशेषाधिकार का प्रयोग संवैधानिक मर्यादा में रह कर ही करे।

0 अधिकारपृच्छा याचिका जारी का है अधिकार
अनिल यादव के मामले में इस बात पर लंबी बहस हुई कि क्या हाईकोर्ट को आयोग अध्यक्ष के मामले में अधिकार पृच्छा (को-वारंटो रिट) याचिका जारी करने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि अधिकार पृच्छा लोक पद पर गलत नियुक्तियों को रोकने के लिए जारी की जाती है। इसका उद्देश्य गैरकानूनी प्राधिकारी को काम करने से रोकना है। जहां लोक पद बिना संवैधानिक प्राधिकार के हासिल किया गया है कोर्ट को याचिका जारी करने का अधिकार है।

0 मुश्किल होगी सुप्रीमकोर्ट की राह
प्रदेश सरकार और अनिल यादव के लिए हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देनी की राह आसान नहीं होगी। हाईकोर्ट ने सुप्रीमकोर्ट द्वारा प्रतिपादित न्यायिक निर्णयों के सिद्धांतों के आधार पर ही फैसला सुनाया है। मुख्य रूप से सलिल सब लोग केस, ए मनोहर रेड्डी केस और पंजाब लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष हुड्डा के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का आधार लिया गया है।
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