शादी सात फेरों के साथ प्यार से बंधा एक रिश्ता है। सात जन्मों को साथ निभाने का वादा, जिंदगी के हर सुख-दुख और पारिवारिक जिम्मेदारियों को मिल-जुल निभाने की कसम, मगर आज सात जन्म तो दूर, कई शादियां सात माह भी नहीं टिक पा रहीं। युवाओं में आपसी सामंजस्य, ईगो, कॅरियर, शक जैसी बातें अटूट माने जाने वाले रिश्ते पर हावी हो रही हैं। वैवाहिक रिश्तों में विश्वास की डोर इतनी कच्ची सी हो गई है कि जरा सी बात पर टूट जाती है और मामले परिवार न्यायालय की दहलीज तक पहुंच जाते हैं। परिवार न्यायालय में ऐसे तमाम मामले हैं, जहां मामूली मन-मुटाव तलाक और सेपेरेशन की नौबत तक पहुंच गया।
केस एक- झूंसी की प्रीति और अनिल की छह महीने पहले लव मैरिज हुई थी। शादी के तीन महीने तक तो सब कुछ ठीक चलता रहा लेकिन इसके बाद स्थिति बदलने लगी। प्रीति और अनिल दोनों वर्किंग हैं। शादी से पहले दोनों में ही जॉब करने की सहमति बनी थी। मगर शादी के बाद अनिल को विदेश में जॉब करने की धुन सवार हो गई जबकि प्रीति चाहती थी कि अनिल देश में ही कॅरियर बनाए। धीरे-धीरे आपसी सामंजस्य इस कदर बिगड़े की नौबत मारपीट तक आ गई। प्रीति ने परिवार न्यायालय में हिंदू मैरिज एक्ट के तहत सेपरेशन की अर्जी दाखिल की है।
केस दो- सोहबतियाबाग के सोमेश और जया की शादी तीन साल पहले हुई थी। शादी के एक साल दोनों बहुत खुश थे, मगर जय के प्रमोशन के बाद स्थितियां बदल गईं। प्रमोशन के साथ जया की सैलरी भी बढ़ गई लेकिन सोमेश को प्रमोशन नहीं मिला। सैलरी का यह अंतर उनके उनके रिश्ते पर बतौर तनाव दिखने लगा। धीरे-धीरे रिश्ते इतने खराब हो गए कि जया ने सोमेश का घर छोड़ दिया। शादी के दो साल पूरे होने के बाद जया ने तलाक का केस दाखिल किया है।
काउंसलर ऋतंधरा मिश्रा का कहना है कि युवाओं में आपसी सामंजस्य न होना सबसे बड़ी कमी है। असल में वह शादी की मतलब ही नहीं समझना चाहते हैं। शादी का मतलब है एक ऐसा रिश्ता जो आपसी प्रेम और विश्वास पर टिका हो। जिसमें जिम्मेदारियों को साथ निभाने की हिम्मत हो, लेकिन असल में ऐसा नहीं है। शादी के बाद वह एक-दूसरे को समझने का मौका ही नहीं देना चाहते हैं। छोटे-छोटे मनमुटाव को दूर करने के बजाए वह उसे इतना तूल दे देते हैं कि रिश्ता बिगड़ता चला जाता है और नौबत तलाक तक पहुंच जाती है।
जो युवा लव मैरिज कर रहे हैं उनके रिश्ते भी कमजोर साबित हो रहे हैं। शादी के बंधन में बंधने के बाद जिम्मेदारियां आते ही प्यार गायब हो जा रहा है। पति-पत्नी दोनों को ही एक-दूसरे से ही शिकायत होती है कि तुम शादी से पहले तो ऐसे नहीं थे।
समाजशास्त्री हेमलता श्रीवास्तव का कहना है कि युवाओं में आज न तो भावनात्मक स्थायित्व और न ही वैचारिक। इसके पीछे कहीं न कहीं परिवार में दी जाने वाली परवरिश भी जिम्मेदार है। परिवार में रिश्तों का मान रखने और उसे बनाए रखने की सीख भी दी जानी चाहिए। युवा आज छोटी-छोटी बातों पर इतना भावनात्मक हो जाते हैं कि बिना सोचे-समझे कुछ भी बोलते और करते हैं। रिश्ते कपड़ों की तरह हो गए हैं, जब तक चाहा पहना और जब पसंद नहीं आया तो छोड़ दिया।
सेपरेशन (पृथककरण) हिंदू मैरिज एक्ट 1955 के तहत दाखिल किया जाता है। इसमें कोर्ट से पति या फिर पत्नी सिर्फ अलग-अलग रहने की अनुमति मांगते हैं। पत्नी को अगर पति से अलग रहते हुए भी खर्च चाहिए तो वह सेक्शन-125 के अंतर्गत भरण-पोषण का वाद दाखिल कर सकती है। वहीं तलाक में कानूनी से पति-पत्नी अलग हो जाते हैं ओर अपनी जिंदगी जीने के लिए स्वतंत्र होते हैं। इसमें भी पत्नी भरण-पोषण के लिए दावा सेक्शन-125 के तहत ही कर सकती है। तलाक और सेपरेशन दोनों ही स्थिति पत्नी को भरण-पोषण तभी मिलेगा, जब वो घरेलू होगी या फिर कामकाजी तो हो लेकिन इनकम टैक्स न भरती हो।