सिविल सेवा में हिंदी पट्टी के प्रतियोगियों के निराशाजनक प्रदर्शन का दौर जारी है। इसके पीछे परीक्षा के नए प्रारूप के अनुरूप प्रतियोगियों को खुद को नहीं ढाल पाना तो मुख्य कारण है ही, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में गोष्ठी और व्याख्यान की टूटती परंपराएं भी प्रतियोगियों के टूटते सपनों की वजह हैं। विश्वविद्यालय और छात्रावासों में सिविल सेवा और पीसीएस को ध्यान में रखकर गोष्ठी, व्याख्यान, कार्यशाला आदि आयोजन होते थे। यहां के प्रतियोगियों की सफलता केपीछे ये मुख्य आधार हुआ करते थे।इसी आकर्षण में पूर्वांचल ही नहीं दूसरे भाग के युवा अब भी इलाहाबाद में तैयारी के लिए खींचे आ रहे हैं, लेकिन उन्हें निराशा मिलती है।
इसके अलावा अंग्रेजी और साक्षात्कार में अपेक्षित प्रदर्शन न कर पाना यहां के प्रतियोगियों की मुख्य चिंता है। इस कमी को दूर करने के लिए विश्वविद्यालय में साक्षात्कार और अंग्रेजी के लिए विशेष कक्षाओं के प्रावधान का निर्णय लिया गया है, लेकिन वर्षों बाद भी इसे लागू नहीं किया जा सका। यहां के प्रतियोगियों को इससे लगातार मायूसी हाथ आ रही है। निराशाजनक परिणाम की स्थिति प्रारंभिक परीक्षा से ही है। सिविल सेवा-2015 प्रारंभिक परीक्षा में सीसैट को क्वालीफाइंग पेपर करने के बाद परिणाम कुछ बेहतर हुआ था। ऐसे में अंतिम परिणाम में काफी उम्मीद थी, लेकिन मुख्य परीक्षा के रिजल्ट के बाद ही सपने टूटते दिखे। पिछले दिनों घोषित मुख्य परीक्षा में यहां गिनती के अभ्यर्थी सफल हुए। ऐसे में अंतिम परिणाम तो और निराशाजनक होना तय है।
गरिमा वापस लाने की फिर कवायद
पुरानी गरिमा स्थापित करने के लिए विश्वविद्यालय में एक बार गोष्ठी, व्याख्यान आदि की परंपरा शुरू करने की कवायद शुरू की गई है। पूर्व डीएसडब्ल्यू डॉ.एआर सिद्दीकी की अगुवाई में इसके अंतर्गत विभागों और छात्रावासों में चरणबद्ध तरीके से इस आयोजनों का प्र्रस्ताव तैयार किया गया है। हॉस्टल प्रशासन से इस बाबत प्रस्ताव भी मांगे गए हैं। प्रोफसर एआर सिद्दीकी का दावा है कि शुक्रवार को भूगोल विभाग से इस परंपरा की शुरुआत हुई। इसके अलावा छात्र-छात्राओं के लिए एक कमेटी भी बनाई गई है। यह जिम्मेदारी प्रोफेसर जटाशंकर को दी गई है। कई कालेजों में भी विशेष कक्षाएं तथा मुफ्त कोचिंग की पहल की गई है।
छात्रसंघ चुनाव में बना मुद्दा
विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में सिविल सेवा में लगातार असफलता हर बार मुद्दा बना। प्रत्याशियों ने चुनावी एजेंडे में शामिल किया कि विश्वविद्यालय और कालेजों में सिविल सेवा तथा अन्य प्रतियोगियों परीक्षाओं को ध्यान में रखकर विशेष कक्षाएं चलवाने तथा व्याख्यान, गोष्ठी की पुरानी परंपरा शुरू करवाने के लिए वे लड़ाई लड़ेंगे, लेकिन यह सिर्फ मुद्दा बनकर ही रह गया। कोई ठोस पहल नहीं हुई।