महिलाओं और युवतियों में रेल बजट को लेकर थोड़ी खुशी, थोड़ी कसक है। महिलाओं की सुरक्षा और सेहत की बात तो की गई लेकिन इतनी नहीं जितनी कि उम्मीद थी। एक मां के नजरिये से कहें तो रेल बजट में बेबी फूड और दूध को शामिल करना सुखद है। ‘अमर उजाला’से बातचीत में महिलाओं ने मिलीजुली प्रतिक्रिया जताई।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय बीएससी अंतिम वर्ष की छात्रा स्तुति सिंह कहती हैं, हर ट्रेन और हर कैगेटरी में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण काफी अच्छा है। इस व्यवस्था से अकेले सफर करने वाली लड़कियों, महिलाओं को रिजर्वेशन में काफी सहूलियत होगी। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहीं डॉ.रमा मिश्रा कहतीं हैं, 33 प्रतिशत आरक्षण अच्छा है, लेकिन असल बात तो सुरक्षा की है। 24 घंटे वाली हेल्पलाइन 182 कितनी कारगर होगी, इस पर संशय है। चलती ट्रेन में अगर किसी के साथ छेड़खानी होती है तो यह हेल्पलाइन कैसे काम करेगी। क्या हर ट्रेन में महिला हेल्पलाइन से जुड़े लोग मौजूद होंगे। यह स्पष्ट नहीं है।
लूकरगंज निवासी रितिका चटनानी कहतीं हैं कि महिलाओं को दरवाजे के पास की सीटें नहीं दी जाएगीं। यह अच्छा कदम है लेकिन महिला सुरक्षा के लिहाज से यह बहुत कारगर कदम नहीं है। लेडीज वाशरूम की अलग से व्यवस्था करने की मांग की जा रही थी, जिस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया जबकि महिलाओं की नजर से सुरक्षा की तरह यह भी संवेदनशील मुद्दा है।
साउथ मलाका निवासी नीतू शर्मा ने दो टूक कहा, ट्रेन की महिला कोच में न तो सुविधाएं होती हैं और न ही सुरक्षा। लंबे समय से महिला कोच को सबसे पीछे लगाने के बजाए बीच में लगाने और उसमें महिला पुलिस की व्यवस्था की मांग की जा रही थी जिस पर ध्यान नहीं दिया गया। हालांकि बेबी फूड और दूध की व्यवस्था सुखद है। आजाद नगर की ऊषा ओझा कहतीं हैं, सभी ट्रेनों में सीनियर सीटिजंस के लिए 120 सीटें आरक्षित करने का फैसला अच्छा कदम है।