राष्ट्रद्रोह के आरोपी जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को लेकर देश भर में विरोध और समर्थन के बीच तेजी से बदलती नई पीढ़ी की सोच और निहित स्वार्थों के लिए ओछी राजनीति का सच सामने आया है। संभवत: भारत, दुनिया का ऐसा अकेला देश है जिसकी राजधानी में राष्ट्रविरोधी नारे लग रहे हैं और समाज के कथित जिम्मेदार लोग तथा रहनुमा जुमलेबाजी केबीच राजनीतिक रोटियां सेंकने में मशगूल हैं। चर्चा केबीच यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मार्क्सवाद के मायने बदल गए हैं। देश की राजनीति और युवा दोनों दिशाहीन हैं या फिर युवाओं की जिद की वजह और जमीन क्या है।
अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर एमपी दुबे कहते हैं, जेएनयू में लगे पाकिस्तान जिंदाबाद केनारे को किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता है। उस घटना के बाद से भी जो कुछ हो रहा है, वह और भी गलत है। जेएनयू की घटना में मार्क्सवाद को गलत तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है। मार्क्सवाद शोषितों के साथ है, जबकि इससे जुड़े लोग उस वर्ग से नहीं आते। राजनीति का विकृत चेहरा सामने आया है, अपनाया गया तरीका सही नहीं है। वास्तविकता से दूर, कुछ लोग कैंपस में ही बैठकर देश को बदलना चाहते हैं, यह उचित नहीं।
जानी-मानी समाजशास्त्रीडॉ.हेमलता श्रीवास्तव कहती हैं कि जेएनयू की घटना साबित करती है कि भटके हुए लोग हर जगह हो सकते हैं, फिर चाहे वह छात्र हों या अध्यापक। उनका व्यवहार बताता है कि उनके परिवार का संस्कार भी ऐसा ही है। आज सामाजीकरण से ज्यादा राजनीतिकरण हावी है। रिश्ते भी इससे अछूते नहीं है। विद्यार्थियों का ध्यान शिक्षा से ज्यादा राजनीति पर है। जो धरती आपकी मातृभूमि है, उसके लिए आपत्तिजनक बातें कैसे कही जा सकती हैं। संतानोत्पत्ति की क्षमता खत्म हो जाए तो भी मां का दर्जा नहीं बदल जाता। दल का विरोध हो सकता है, देश का नहीं। जेएनयू की घटना से जुड़े लोगों का देश के साथ ही देश के कानून और संविधान में आस्था नहीं है।
जेएनयू के छात्र रहे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर मोहम्मद असलम कहते हैं, राष्ट्रविरोधी भावनाओं से कौन जुड़ना चाहेगा। जेएनयू में हमेशा से एंटी गवर्नमेंट होता रहा है। एक छोटी भी बेवकूफी से बात यहां तक आ पहुंची। हर राजनीतिज्ञ अपनी-अपनी तरह से बयान देने में जुटा है। पाकिस्तान से तुलना का तो कोई सवाल ही नहीं उठता है क्योंकि वहां के हालात बहुत खराब हैं। इस घटना को तूल देकर ऐसे लोगों का मकसद हल किया गया।
मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग के प्रोफेसर एनआर फारुकी कहते हैं, परिसर में देशद्रोही नारे लगना दुर्भाग्यपूर्ण है, ऐसा नहीं होना चाहिए, यह गलत है। सच तो यह कि पढ़ाई और राजनीति दोनों को अलग-अलग रखना चाहिए। विश्वविद्यालय परिसर किसी भी तरह की देशविरोधी राजनीति का अखाड़ा न बने। यूरोप या अमेरिका की किसी भी युनिवर्सिटी में ऐसी राजनीति नहीं होती, विश्वविद्यालय पठन-पाठन का केंद्र है, यह छात्रों और शिक्षकों दोनों को सोचना चाहिए।
नेहरू ग्राम भारती विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर केबी पांडेय कहते हैं, जेेेएनयू की घटना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। यह खबर सुनकर रूह कांप गई। वहां जो कुछ हुआ, वह राष्ट्रविरोधी प्रवृत्ति का नंगा नाच था। उन स्थितियों में जब सुप्रीम कोर्ट ने किसी मुद्दे पर अपना फैसला दे दिया हो तो ऐसेे में उस आयोजन का कोई औचित्य ही नहीं था। जो युवा राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रीयता से भटक गए हैं, उसके पीछे भी हमारे राजनेता ही हैं। देश, दल से ऊपर है। दल की सफलता के लिए जो शार्टकट अपनाए जा रहे हैं, वह अनुचित है लेकिन धीरे-धीरे देश मन से इन चीजों के प्रतिकार के लिए तैयार हो रहा है।