3 अगस्त: ज्ञानवापी के सर्वे को हरी झंडी
हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश प्रीतिंकर दिवाकर और न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की खंडपीठ ने एएसआई के इस आश्वासन पर वैज्ञानिक सर्वेक्षण की अनुमति दे दी कि ज्ञानवापी के मूल ढांचे को कोई नुकसान नहीं होगा। हिंदू पक्ष का दावा है कि ज्ञानवापी में 100 फीट ऊंचा आदि विश्वेश्वर का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग है। काशी विश्वनाथ मंदिर का करीब 2050 साल पहले महाराजा विक्रमादित्य ने करवाया था, जिसे मुगल सम्राट औरंगजेब ने 1664 ईस्वी में तुड़वा कर ज्ञानवापी मस्जिद बनवा दी।
19 दिसंबर को अंजुमन इंतजामिया मसाजिद की पांच याचिकाओं को भी न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने खारिज कर दिया। इस मामले में पहले न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की पीठ फैसला देने वाली थी, लेकिन ऐन दिन तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश प्रीतिंकर दिवाकर ने मामला अपनी कोर्ट में स्थानांतरित कर लिया। सुनवाई खुद की, लेकिन सेवानिवृत होने से पहले फैसला नहीं सुना सके। कोर्ट ने ज्ञानवापी को राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा बताते हुए वाराणसी में लंबित दीवानी वाद को चलाने की अनुमति भी दे दी।
14 दिसंबर: मथुरा की शाही ईदगाह का सर्वे
न्यायमूर्ति मयंक कुमार जैन की पीठ ने मथुरा की शाही ईदगाह और श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद सुलझाने के लिए इसके वैज्ञानिक सर्वेक्षण की अनुमति दे दी है। इसी दिन याची संख्या छह के रूप में भगवान श्रीकृष्ण (प्रतिमा) भी पास बनवाकर पैरवी के लिए हाईकोर्ट पहुंच गए थे। 18 दिसंबर को एडवोकेट कमीशन का खाका खींचे जाने से पहले मुस्लिम पक्षकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए, इसलिए सुनवाई आठ जनवरी को नियत की गई है।