अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सहायक अभियोजन अधिकारी से रिपोर्ट मांगी। मामले में तब तक आरोप पत्र दाखिल नहीं किया जा सका था। अदालत के आदेश के बाद सहायक अभियोजन अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी। इसके बाद एक दूसरी रिपोर्ट प्रस्तुत की गई और इसी बीच एक आरोप पत्र दायर किया गया। इसे आधार बनाते हुए अदालत ने डिफॉल्ट जमानत के लिए उसकी याचिका को खारिज कर दिया। याची ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश को हाईकोर्ट को चुनौती दी।
अदालत ने विक्रमजीत सिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच के फैसले का हवाला दिया, जिसमें यह आदेश पारित किया गया था कि धारा 167(2) के तहत यदि अभियोजन द्वारा निर्धारित अवधि के भीतर आरोप पत्र दायर नहीं करता है तो उसे जमानत का लाभ पाने का अधिकार है। कोर्ट ने न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन के नेतृत्व वाली पीठ के आदेश का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि धारा 167 (2) के पहले प्रावधान की शर्तों को पूरा करने के बाद आरोपी व्यक्ति को जमानत पाने का मौलिक अधिकार है।