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UP: 49 साल बाद भी न मिली राहत, 300 रुपये की ली थी घूस, लेखपाल की सजा बरकरार; इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Tue, 07 Jul 2026 11:45 AM IST
Sharukh Khan अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

49 साल बाद भी रिश्वतखोर को राहत नहीं मिली है। 300 रुपये की रिश्वत लेने वाले लेखपाल की इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखी है।  1977 में विजिलेंस ने आरोपी को पकड़ा था। चार सप्ताह में सरेंडर कर शेष सजा काटने का आदेश दिया है।
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Allahabad High Court - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 49 साल पुराने रिश्वत के मामले में लेखपाल की एक साल के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी। कोर्ट ने 41 साल पुरानी आपराधिक अपील खारिज कर दोषी को चार सप्ताह में संबंधित ट्रायल कोर्ट में सरेंडर कर बची सजा काटने का आदेश दिया है।
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यह आदेश न्यायमूर्ति संजीव कुमार की एकल पीठ ने महेश चंद की याचिका पर दिया। अभियोजन के अनुसार कानपुर की एक तहसील में तैनात लेखपाल महेश चंद ने भूमि विवाद में एक पक्षकार से दूसरे की अपील खारिज कराने के नाम पर 400 रुपये रिश्वत मांगी थी। शिकायत के बाद विजिलेंस ने फिनॉल्फ्थेलीन पाउडर लगे 100-100 रुपये के तीन नोट शिकायतकर्ता को दिए। 

होटल में जैसे ही महेश चंद ने 300 रुपये लेकर उन्हें अपनी जेब में रखा, विजिलेंस टीम ने रंगे हाथों पकड़ लिया। ट्रायल कोर्ट ने 1985 में महेश चंद को दोषी ठहराते हुए एक साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद दोषी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, जो चार दशक से अधिक समय तक लंबित रही। 
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बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने दलील दी कि शिकायतकर्ता की गवाही अदालत में नहीं कराई गई। इसलिए अभियोजन का मामला संदेहास्पद है। सार्वजनिक स्थान पर रिश्वत लेना स्वाभाविक नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि यदि ट्रैप की कार्रवाई विजिलेंस अधिकारियों और स्वतंत्र गवाहों की विश्वसनीय गवाही से पूरी तरह सिद्ध हो जाती है तो केवल शिकायतकर्ता के गवाही न देने से पूरा मामला कमजोर नहीं हो जाता। 

 
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ट्रैप की कार्रवाई गोपनीय तरीके से की जाती है। इसलिए सार्वजनिक स्थान पर आरोपी का पकड़ा जाना अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी। आरोपी की जमानत और निजी मुचलका निरस्त कर सरेंडर का आदेश दिया है। 
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