इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति पर लगाए गए आरोपों से उसके द्वारा अपराध करने की संभावना ज्यादा है। ऐसी स्थिति में आरोप तय करने के स्तर पर उन्मोचन अर्जी स्वीकार नहीं की जा सकती है। आरोपित के खिलाफ प्रस्तुत साक्ष्य से ऐसा लगता है कि वह सही है।
आरोपित गुनहगार है तो मुकदमे का ट्रायल किया जाना चाहिए। क्योंकि, साक्ष्य की सत्यता का परीक्षण ट्रायल में होगा। इसके साथ कोर्ट ने युवती को शादी का झांसा देकर दो वर्ष तक शारीरिक संबंध बनाने और फिर शादी के लिए दहेज मांगने के आरोपित मथुरा के चमन मंगला की पुनरीक्षण अर्जी खारिज कर दी है।
यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव ने दिया है। याची ने मुकदमे में आरोपमुक्त करने के लिए सेशन कोर्ट मथुरा में डिस्चार्ज (उन्मोचन) अर्जी दाखिल की थी। जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में पुनरीक्षण अर्जी दाखिल की गई। याची की ओर से कहा गया कि पीड़िता व उसके बीच आपसी सहमति से संबंध बने थे इसलिए दुष्कर्म का आरोप सही नहीं है। एफआईआर व मजिस्ट्रेट के समक्ष पीड़िता के बयान में भी विरोधाभास है।
सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा-227 के तहत उन्मोचन अर्जी पर विचार करते समय यह देखा जाना चाहिए कि जो साक्ष्य उपलब्ध हैं। उनके साबित होने पर अपराध की संभावना है या नहीं, याची के विरुद्ध जो साक्ष्य उपलब्ध हैं, उनके आधार पर सेशन कोर्ट का अर्जी खारिज करने का निर्णय सही है। ब्यूरो