कहा-कानून मंत्री रविशंकर का बयान गैरजिम्मेदाराना और राजनीतिक
हाईकोर्ट बार ने की निंदा, मंत्री को पद से हटाने की मांग
प्रयागराज। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की बेंच गठित करने को लेकर केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के संसद में दिए बयान ने बार फिर विवाद छेड़ दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकीलों के लिए हमेशा से संवेदनशील रहे इस मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री के बयान पर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। एसोसिएशन की एक बैठक बृहस्पतिवार को लाइब्रेरी हॉल में हुई जिसमें बयान की निंदा करते हुए कहा गया कि यह पूरी तरह से राजनीतिक और गैर जिम्मेदाराना बयान है। इस प्रकार के बयानों से न्याय प्रक्रिया में बाधा पहुंचती है।
हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी मांग की है कि केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को उनके पद से हटाया जाए क्योंकि, उन्होंने स्वार्थ से प्रेरित होकर पश्चिमी बेंच के संबंध में बयान दिया है। बार एसोसिएशन ने उत्तर प्रदेश के राजनेताओं से भी अपील की है कि वह प्रदेश की प्रशासनिक और न्यायिक स्थिरता बनाए रखने में सहयोग करें। बैठक की अध्यक्षता बार के अध्यक्ष राकेश पांडेय और संचालन संयुक्त सचिव प्रशासन प्रियदर्शी त्रिपाठी ने की। इसमें अलिखलेश कुमार मिश्र, वीरेंद्र नाथ उपाध्याय, श्रीकांत केसरवानी, अजीत कुमार यादव, सौरभ तिवारी, विजय सिंह सेंगर, आशुतोष पांडेय, सर्वेश कुमार दुबे, नीलम शुक्ला, सुरेंद्र नाथ मिश्र सहित कार्यकारिणी के सभी सदस्य और अधिवक्तागण मौजूद थे।
पश्चिमी यूपी में हाईकोर्ट की बेंच
प्रयागराज। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की बेंच बनाने का मुद्दा केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के बयान से भले ही गरमा गया है, मगर इस मुद्दे फिलहाल नया कुछ नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2015 में ही साफ कर दिया था कि उनके पास पश्चिमी यूपी में बेंच के गठन का न तो कोई प्रस्ताव है और न ही वह इस पर विचार कर रहे हैं। तत्कालीन अखिलेश यादव की सरकार ने भी साफ शब्दों में कहा था कि वह विभाजन के पक्ष में नहीं है।
जानकारों का मानना है कि केंद्रीय मंत्री का बयान सिर्फ राजनीतिक है। वैसे भी बेंच गठन का मामला पूरी तरह से प्रदेश सरकार और हाईकोर्ट के बीच का है। केंद्र की भूमिका इसके बाद शुरू होगी। बार के अध्यक्ष राकेेश पांडेय का कहना है एक प्रकार से केंद्रीय मंत्री ने अपने बयान में यह भी साफ कर दिया है कि बेंच के मुद्दे पर केंद्र सरकार तबतक कुछ नहीं कर सकती जबतक हाईकोर्ट कोई कदम नहीं उठाता है। लिहाजा बयान सिर्फ राजनीति से प्रेरित है।
बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता राधाकांत ओझा का कहना है कि दिसंबर 2014 और जनवरी 2015 में बेंच के मुद्दे पर हाईकोर्ट के वकीलों के विरोध के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डा. डीवाई चंद्रचूड ने स्थिति साफ की थी कि हाईकोर्ट के पास पश्चिमी यूपी में बेंच बनाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। इससे पूर्व 1989 में भी फुलकोर्ट ने विभाजन के विरोध में प्रस्ताव पारित किया था। इससे साफ है हाईकोर्ट इस मुद्दे पर विचार नहीं कर रहा है। कानून मंत्री का बयान भ्रामक और राजनीति से प्रेरित है। जिसकी हम भर्त्सना करते हैं।
बार कौंसिल भी विभाजन के विरोध में पारित कर चुका है प्रस्ताव
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट की प्रदेश में कोई भी दूसरी बेंच बनाने के विरोध में खुद बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश प्रस्ताव पारित कर चुका है जो आज भी लागू है। इसके बावजूद कौंसिल के अध्यक्ष हरिशंकर सिंह द्वारा पश्चिमी बेंच के समर्थन में दिए गए बयान को खुद बार कौंसिल के सदस्य ही अवैधानिक मान रहे हैं।
दर असल 16 मार्च 1981 को हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने एक प्रस्ताव पारित किया था कि हाईकोर्ट की प्रदेश में दूसरी कोई बेंच नहीं बनने दी जाएगी। इस प्रस्ताव के समर्थन में बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश ने प्रस्ताव संख्या 368/81 दिनांक 11 अप्रैल 1981 को पारित प्रस्ताव में हाईकोर्ट बार का समर्थन करते हुए था कि वह हाईकोर्ट विभाजन के विरोध में है। कौंसिल के पूर्व चेयरमैन सीनियर एडवोकेट बीके श्रीवास्तव कहते हैं कि बार कौंसिल का यह प्रस्ताव अभी भी लागू है क्योंकि इसे न तो कभी बदला गया और न ही कभी रद्द हुआ। ऐसे में अध्यक्ष हरिशंकर सिंह का बयान अपने ही प्रस्ताव के विरोध में होने के कारण अवैधानिक है।
संविधान में है एक हाईकोर्ट की व्यवस्था
भारत के संविधान के अनुच्छेद 214 में कहा है गया है कि हर राज्य का एक हाईकोर्ट होगा। इस अनुच्छेद में किसी खंडपीठ का जिक्र नहीं है। कानून के जानकारों का मानना है कि इस स्थिति में खंडपीठ का गठन कानूनी प्रावधानों के विरोध है।
सुप्रीमकोर्ट ने कहा है, दूरी नहीं है बेंच का आधार
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की बेंच के गठन को लेकर आमूमन यह तर्क दिया जाता है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट पश्चिम के वादकारियों के लिए काफी दूर है। अवेकनिंग अगेंस्ट बाइफरकेशन ऑफ हाईकोर्ट पुस्तक के लेखक सीनियर एडवोेकेट बीके श्रीवास्तव का कहना है कि सुप्रीमकोर्ट ने बार एसोसिएशन ऑफ कर्नाटक बनाम यूनियन ऑफ इंडिया(एआईआर 2000एसी पेज 2544, रिट संख्या 389/2000) में साफ किया है कि हाईकोर्ट की दूरी बेंच बनाने का आधार नहीं हो सकती है।