पौष पूर्णिमा के प्रथम स्नान से माघ मेले की शुरुआत होगी लेकिन एकादशी के शुभ मुहूर्त में ही तमाम कल्पवासी शुक्रवार को ही संगम की रेती पहुंचे। तीर्थ पुरोहितों के अधूरे शिविर में अभी बुनियादी सुविधा बहाल नहीं हो पाई है। इससे कल्पवासियों को परेशानी का सामना करना पड़ेगा। माघ मेला में आस्था की नगरी बसाने आए खाक चौक, संगम लोअर, दंडीबाड़ा आचार्य बाड़ा काली सड़क गंगोली शिवाला, जीटी रोड त्रिवेणी रोड आदि क्षेत्रों में शिविर निर्माण करा रहे संतों और तीर्थपुरोहितों का कहना है कि प्रशासन की ओर से की जानी वाली तैयारियां अभी अधूरी हैं। भूमि आवंटन में देरी के कारण उनके शिविर भी अभी पूरे नहीं हो पाए हैं। वहीं, कल्पवासियों के आने से मेले की रौनक बढ़ने लगी है।
तीर्थपुरोहित विपुल पंडा निशान हाथी महावीर मार्ग स्थित शिविर में व्यवस्था मुहैया कराने मेें लगे थे। उनके शिविर में पहुंचे हनुमना रीवां के विंध्यवासिनी केसरवानी अपनी 65वर्षीय मां के साथ कल्पवास करेंगे। वे देर शाम तक अपनी कुटिया को व्यवस्थित करने में लगे रहे। विपुल पंडा बताते हैं कि शहर से चार और मध्यप्रदेश से चार परिवार उनके शिविर पहुंचे हैं। अखिल भारतीय तीर्थपुरोहित महासभा के महामंत्री मधु चकहा के मुताबिक पौष पूर्णिमा से मेला शुरू हो जाएगा। तीर्थपुरोहितों के यहां 25 फीसदी श्रद्धालु पहुंच गए हैं। उनके आने का क्रम रविवार तक चलेगा। कहा, अभी तक शिविर का काम पूरा नहीं हो पाया है। कहा, तीर्थपुरोहितों को गाटा रोड में बसाया जाता है। अभी तक गाटा रोडों पर चकर्ड प्लेट नहीं बिछाई गई है। खाकचौक कल्याण समिति के महामंत्री विद्याधर दास कहते हैं कि मुख्य सड़कों को छोड़कर पूरे मेले में अव्यवस्था है। अभी बुनियादी सुविधाएं मुहैया स्नानघाट बनाने का काम भी धीमी गति से किया जा रहा है।
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के अनुसार माघ में किया गया एक माह का कल्पवास एक कल्प के बराबर अर्थात 4320000000 वर्षों तक किए गए पुण्य के बराबर होता है। कल्पवास के पुण्य से भगवान शिव ने त्रिपुर राक्षस का वध, भारद्वाज मुनि ने सप्तर्षि में स्थान पाया। कल्पवास से सनकादि ऋषियों को आत्मदर्शन, वैवस्वतमनु ने इष्ट सिद्धि प्राप्त की। कल्पवास करने से देव, पितर प्रसन्न होते हैं। आयुर्वेदाचार्य एस के राय के मुताबिक माघ मास में गंगा की रेती पर किया जाने वाला कल्पवास, कायाकल्प करने वाला है। इस दौरान किए जाने वाले अनुशासन से मानसिक शारीरिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य संतुलित होता है। जिससे लोगों में जीवन के प्रति सार्थक द्रष्टिकोण पैदा होता है। शरीर में जमा अपक्व रस, व्रत संयमी जीवन और गंगा की रेती में नंगे पैर चलने से पक्व हो शरीर से निकल जाता है। पेट में होने वाली बीमारियां, गठिया और अवसाद आदि नियंत्रित हो जाती है।