महाकुंभ के दौरान गंगा में कॉस्मेटिक व भारी धातुओं से होने वाले प्रदूषण की निगरानी आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस (एआई) के जरिये की जाएगी और कुछ ही सेकेंड में परिणाम सामने होंगे।
इसके लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) के भौतिक विज्ञान विभाग में वैज्ञानिक दल का गठन किया गया है, जो जांच परिणाम मेला प्रशासन व अन्य सरकारी एजेंसियों से साझा करेगा।
30 सदस्यीय इस दल ने भौतिक विज्ञान विभाग की 100 साल पुरानी प्रयोगशाला में स्पेक्ट्रोस्केपी के अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से गंगा जल के नमूनों की जांच शुरू कर दी है।
शुरुआती सफलता के बाद विभाग की ओर से एक नया प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए तकरीबन दो करोड़ रुपये का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया है, जिसे जल्द ही मंजूरी मिलने की उम्मीद है।
प्रोजेक्ट मंजूर होने के बाद सवा करोड़ रुपये की लागत से एटॉमिक फोर्स माइक्रोस्कोप (एएफएम) खरीदा जाएगा, जिसे रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक से एकीकृत कर जांच की जाएगी, जिससे परिणाम और भी जल्द सामने आएंगे व ज्यादा सटीक होंगे।
भौतिक विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. केएन उत्तम ने बताया कि वैज्ञानिक दल में छात्र, शोधार्थी और शिक्षक शामिल हैं। इन्होंने प्रयोगशाला में जल प्रदूषण की जांच का काम शुरू कर दिया है और स्पेक्ट्रोस्कोपी विधि से कुछ ही सेकेंड में परिणाम सामने आ रहे हैं।
इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। महाकुंभ के दो महीने पहले से लेकर महाकुंभ के दो माह बाद तक गंगा जल के नमूनों की जांच की जाएगी, ताकि पता लगाया जा सके कि कुंभ से पहले, कुंभ के दौरान और बाद में प्रदूषण की क्या स्थिति रही।
कहा कि हमारा प्रयास होगा कि महाकुंभ के प्रमुख स्नान पर्वों पर भी अलग-अलग स्थानों से नमूने इकट्ठे किए जाएं। इसके लिए ड्रोन का इस्तेमाल करना पड़ सकता है, जिसके लिए प्रशासन व शासन से अनुमति मांगी जाएगी।
प्रारंभिक जांच में मिला कॉस्मेटिक प्रदूषण
प्रो. केएन उत्तम ने बताया कि नमूनों की प्रारंभिक जांच में कॉस्मेटिक प्रदूषण पाया गया है। दअरसल, महाकुंभ के दौरान विदेशों से भी बड़ी संख्या में लोग गंगा स्नान के लिए आते हैं तो काफी मात्रा में परम्यूम, लिपस्टिक, नेल पॉलिश, पाउडर, फेस पाउडर, फाउंडेशन, आई लाइनर आदि का इस्तेमाल करते हैं। इसमें लेड जैसे कुछ भारी तत्व भी पाए जाते हैं जो सेहत के लिए हानिकारक होते हैं।
फलों, सब्जियों पर भी हो रहा कॉस्मेटिक का उपयोग
प्रो. उत्तम ने बताया कि मिलावट के इस दौर में कॉस्मेटिक में पाए जाने वाले कुछ यौगिकों का इस्तेमाल फलों और सब्जियों पर भी किया जा रहा है, ताकि उन्हें प्राकृतिक रूप से ताजा और हरा-भरा दिखाया जा सके। ये यौगिक पानी से में आसानी से नहीं घुलते हैं। फलों व सब्जियों को धोने और उनका इस्तेमाल करने के बाद कचरे को फेंक दिया जाता है जो ड्रेनेज के माध्यम से गंगा तक पहुंच रहा है।
बदली जीवनशैली में बढ़ा कॉस्मेटिक का चलन
बदली जीवनशैली में कॉस्मेटिक का चलन तेजी से बढ़ा है और घरों के बाथरूम से निकलने वाले पानी में कॉस्मेटिक भी मिले होते हैं। यह नाले-नालियों के रास्ते गंगा तक पहुंच रहे हैं।