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हाईकोर्ट का अहम फैसला : बेचने का समझौता होने से इच्छुक खरीदार को मालिक बनने का नहीं मिल जाता अधिकार

Fri, 16 Jun 2023 12:53 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बेचने का समझौता होने से इच्छुक खरीदार को ऐसा अधिकार नही मिल जाता है कि वह विक्रय भूमि का मालिक बन जाए। समझौते की ताकत एक खरीदार को मालिक नहीं बना सकता है।
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हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बेचने का समझौता होने से इच्छुक खरीदार को ऐसा अधिकार नही मिल जाता है कि वह विक्रय भूमि का मालिक बन जाए। समझौते की ताकत एक खरीदार को मालिक नहीं बना सकता है। कोर्ट ने मामले में याची के खिलाफ दाखिल पूरक आरोप पत्र को गलत माना और कहा कि यह मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना की गई जांच है। याची को गवाही के आधार पर आरोपी बनाया गया है, जो सही नहीं है। कोर्ट ने याची के खिलाफ दर्ज पूरक आरोप पत्र को रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने अजीत कुमार गुप्ता की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।

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मामले में प्रतिवादी ने आरोप लगाया गया था कि वह पिछले 11 वर्षों से अमेरिका में रह रही है। प्रार्थी अजीत कुमार गुप्ता व सह आरोपी नरेंद्र कुमार सिंह व कन्हैया गुप्ता ने गैंगस्टरों की मदद से आनंदपुरी, ट्रांसपोर्ट नगर, कानपुर स्थित उसके मकान पर कब्जा कर लिया। आरोपियों के खिलाफ कानपुर नगर के जूही थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। याची का नाम पूरक आरोप पत्र में सामने आया था।

यह आरोप लगाया गया था कि आरोपी व्यक्तियों ने अपने अवैध कब्जे को सही ठहराने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए हैं। प्रतिवादी ने कभी उनके पक्ष में किसी भी दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं किए और उनके हस्ताक्षर डिजिटल रूप से बनाए गए हैं। प्रतिवादी ने इसकी शिकायत मुख्यमंत्री को एक पत्र भेज कर की थी। उसके बाद प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

याची के वकील ने कहा कि भले ही यह मान लिया जाए कि आवेदक ने गवाह के रूप में बेचने के लिए विवादित समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, फिर भी यह 100 रुपये के स्टाम्प पर लिखा हुआ अपंजीकृत दस्तावेज है और संपत्ति का कोई शीर्षक पारित नहीं हुआ है। उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
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पूरक आरोप पत्र कानूनन गलत है

प्रतिवादी के अधिवक्ता ने कहा कि पुलिस द्वारा मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट से आगे की जांच के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने प्रस्तुत किया कि पुलिस के पास जांच की असीमित शक्ति है और इस तरह की जांच सीआरपीसी की धारा 173 (2) के तहत चार्जशीट दायर किए जाने और मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लिए जाने के बाद भी जारी रह सकती है।

पीठ के समक्ष विचार करने के लिए दो आधार थे।
पहला, क्या एक बार सह-आरोपी के खिलाफ आरोप पत्र जमा करने के बाद जांच अधिकारी द्वारा आगे की जांच करने और पूरक आरोप पत्र दायर करने की कार्रवाई कानून में स्वीकार्य है या नहीं?

दूसरा, क्या बेचने के समझौते पर केवल हस्ताक्षर करने वाले को उसी अपराध के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, जैसा बेचने के समझौते के लाभार्थी द्वारा किया गया है।
पीठ ने कहा कि वर्तमान मामले में आगे की जांच का आदेश देने के लिए मजिस्ट्रेट की शक्ति विवाद में नहीं है। विवाद यह है कि जांच अधिकारी बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के आगे की जांच कर सकता है या नहीं। धारा 173 (8) के अवलोकन से पता चलता है कि रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद जांच अधिकारी द्वारा आगे की जांच के लिए अनुमति प्रदान करता है। इसमें कहीं भी ऐसा करने के लिए मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति का प्रावधान नहीं है। 

कोर्ट ने विनय त्यागी बनाम इरशाद अली और अन्य के मामले का उल्लेख किया। जहां, यह माना गया था कि पुलिस को ‘आगे की जांच'' जारी रखने और पूरक आरोप पत्र दाखिल करने के लिए अदालत की अनुमति लेनी पड़ती है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कई निर्णयों में अनुमोदित किया गया है।
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