उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की कार्यप्रणाली फिर संदेह के घेरे में है। प्रतियोगियों ने जनसूचना अधिकार के तहत लोक सेवा आयोग से जानकारी मांगी थी कि अध्यक्ष और सदस्यों के कार्यकाल के दौरान उनके कितने पुत्र-पुत्रियां आयोग की परीक्षाओं में शामिल हुए। साथ ही पूछा था कि लोक सेवा आयोग की नियमावली में क्या इस बारे में कोई व्यवस्था है? आयोग ने इसका जवाब देने से इनकार कर दिया और कहा कि वांछित सूचना जिस रूप में मांगी गई है, उपलब्ध न होने के कारण नहीं दी जा सकती है।
प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के मीडिया प्रभारी अवनीश पांडेय ने लोक सेवा आयोग से पांच बिंदुओं पर जनसूचना अधिकार के तहत जानकारी मांगी थी। पूछा था कि लोक सेवा आयोग में वर्तमान अध्यक्ष एवं सदस्यों के पुत्र-पुत्री उनके पद धारण के कार्यकाल में आयोग की परीक्षाओं में शामिल होने की अर्हता रखते हैं या नहीं। अध्यक्ष एवं सदस्यों के कार्यकाल में उनके कितने पुत्र-पुत्री आयोग की परीक्षाओं में शामिल हुए। अगर परीक्षा में शामिल हुए हैं तो उनका ब्यौरा दिया जाए। अगर नियमावली में अध्यक्ष एवं सदस्यों के कार्यकाल के दौरान उनके बच्चों के परीक्षा में शामिल होने का उल्लेख है तो उस नियमावली का हवाला भी दिया जाए। इसके अलावा किसी पूर्व अध्यक्ष या सदस्य के कार्यकाल में उनके बच्चों ने परीक्षा दी है तो उन अध्यक्ष/सदस्यों के नाम भी उल्लेख करें। पांच बिंदुओं पर मांगी गई सूचना पर आयोग ने एक लाइन का जवाब दिया कि वांछित सूचना जिस रूप में मांगी जा रही है, उपलब्ध न होने के कारण नहीं दी जा सकती है।
मीडिया प्रभारी अवनीश पांडेय का आरोप है कि आयोग में तीन सदस्यों के बच्चे आयोग की परीक्षाओं में शामिल हो चुके हैं जबकि जानकारी के मुताबिक सेवा नियमावली में स्पष्ट उल्लेख है कि अध्यक्ष/सदस्य के कार्यकाल में उनके बच्चे आयोग की परीक्षाओं में शामिल नहीं हो सकते हैं। इसी वजह से आयोग ने जनसूचना अधिकार के तहत जानकारी देने से इनकार कर दिया। इसका सीधा मतलब है कि लोक सेवा आयोग की कार्यप्रणाली में कोई बदलाव नहीं हुआ है। अगर आयोग पारदर्शी रहता तो उसे सूचना देने में कोई दिक्कत न होती। उनका कहना है कि इस मामले को न्यायालय में ले जाएंगे।
लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं से पहले वहां के कर्मचारियों से इस आशय का शपथपत्र लिया जाता है कि उनके बच्चे आयोग की परीक्षा में शामिल नहीं हो रहे हैं। अगर बच्चे परीक्षा में शामिल हो रहे हैं तो संबंधित कर्मचारी को परीक्षा की प्रक्रिया से अलग कर दिया जाता है। गलत शपथपत्र देने पर कर्मचारी के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई का प्रावधान है।