नए सत्र के लिए दाखिले की दौड़ शुरू हो चुकी है लेकिन गली-गली खुले तकनीकी और प्रबंधन संस्थानों की गिरती साख और नौकरी के सिमटते अवसर के बीच बैंक से लोन लेकर पढ़ाई करने वालों का दर्द फिर से हरा हो गया है। महंगी होती शिक्षा के बीच अधिकतर युवाओं के सामने एजुकेशन लोन लेना मजबूरी है लेकिन बेहतर नौकरी न मिली तो की दिक्कतें बढ़ना स्वाभाविक है। इसमें सबसे बड़ी समस्या बैंक से लिए गए लोन को चुकता करने में आती है।
बता दें, एमबीए की पढ़ार्ई के बाद 93 फीसदी विद्यार्थियों को नौकरी नहीं मिल रही तो बीटेक के बाद भी 75 प्रतिशत से अधिक युवा बेरोजगार हैं। नौकरी मिल भी गई तो इतना वेतन नहीं है कि वे लोन का कर्ज चुकता कर सकें। आलम यह है एजुकेशन लोन के खराब (एनपीए) होने का औसत सबसे अधिक है। इस समस्या की भयावहता को भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन की टिप्पणी से ही समझा जा सकता है। बीते दिनों एक कार्यक्रम में महंगी होती शिक्षा के बीच बैंकों में बढ़ते एनपीए की ओर वह इशारा भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं उन्होंने युवाओं और अभिभावकों को ठगने वाले शिक्षण संस्थानों से बचने के लिए भी आगाह किया था।
बैंक लोन की वापसी में दिक्कत की मुख्य वजह पढ़ाई के बाद नौकरी न मिलना है। यदि नौकरी मिल भी जाती है तो इतना वेतन नहीं मिलता कि वे कर्ज चुका सकें। साधारण से संस्थान से भी एमबीए या बीटेक की पढ़ाई करने में 10 से 15 लाख रुपये खर्च हो जाते हैं। एजुकेशन लोन में खास बात यह है कि पढ़ाई के दौरान किस्त नहीं देनी होती लेकिन इसका परिणाम यह होता है कि कर्ज की राशि बढ़कर डेढ़गुना तक हो जाती है। ऐसे में कोर्स पूरा करके निकलने वाले विद्यार्थियों पर 15 से 20 लाख रुपये का कर्ज हो जाता है।
गौर करने वाली बात यह भी है इस कर्ज की अदायगी अधिकतम 10 साल में करनी होती है। एसबीआई का ही उदाहरण लें तो एजुकेशन लोन पर ब्याज 11.30 प्रतिशत है। इस लिहाज से यदि कर्ज की राशि 15 लाख रुपये है तब भी महीने की तकरीबन 21 हजार रुपये बनेगी, जो उसे 10 साल तक देनी होगी। नियमानुसार वेतन की अधिकतम 50 फीसदी राशि ही किस्त के रूप में काटी जा सकती है। इस लिहाज से पढ़ाई खत्म करने के साथ विद्यार्थियों को हर महीने 40 हजार रुपये से अधिक वेतन की नौकरी मिलनी चाहिए। इतने बड़े पैकेज की नौकरी चुनिंदा संस्थान के विद्यार्थियों को ही मिल पाती है। यही वजह है नौकरी मिलने के बाद भी विद्यार्थी एजुकेशन लोन चुकता नहीं कर पाते।
एजुकेशन में सबसे अधिक एनपीए और हताश युवाओं की लंबी कतार के पीछे बैंकों और शिक्षण संस्थाओं की सांठगांठ भी मुख्य वजह है। अच्छे इंस्टीट्यूट में दाखिला पाने के बावजूद मेधावियों को एजुकेशन लोन नहीं मिल पाता लेकिन एक निचले दर्जे के संस्थान की पहल पर छात्र-छात्रा को लोन दे दिया जाता है। इनके बीच में टाईअप सा हो गया है, जिसके पीछे बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है।
गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के डॉ.सुनीत सिंह कहते हैं, ऐसे उदाहरणों की भरमार है। इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना होगा। हालांकि, बैंकों की ओर से एजुकेशन लोन के लिए कई तरह के मानक निर्धारित किए हैं। इनमें संस्थानों को अलग-अलग कैटेगरी में बांटा गया है। आईआईएम, आईआईटी जैसे संस्थानों में दाखिला पाने वाले विद्यार्थियों को आसानी से लोन मिल जाता है। जिनका परफार्मेंस अच्छा नहीं हैं उनके विद्यार्थियों को लोन देने में बैंक आनाकानी करते हैं। इन स्थितियों के बीच एजुकेशन लोन के क्षेत्र में बढ़ता एनपीए बैंक के लिए सबसे बड़ी चिंता है। साथ ही यह उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल भी खड़ा करता है।
एमबीए, बीटेक या अन्य प्रोफेशनल कोर्सेज की पढ़ाई करने के इच्छुक विद्यार्थियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती संस्थान के चयन को लेकर होती है। वे संस्थानों के बड़े-बड़े दावों के झांसे में भी आ जाते हैं लेकिन अब संस्थानों की रैंकिंग निर्धारण से विद्यार्थियों को मदद मिल सकती है। भारत सरकार की पहल पर नेशनल इंस्टीट्यूट रैंकिंग फ्र्रेमवर्क (एनआईआरएफ) की ओर से सभी तरह के संस्थानों की रैंकिंग की गई है। इसकी मदद से संस्थान का चयन किया जा सकता है।