सरकार के दावों के बीच कर्जमाफी को लेकर एक और सच सामने आ रहा है। होलागढ़ के खखरी गांव के किसान चक्रपाणि के 39,700 रुपये माफ हुए। उन्हें प्रमाणपत्र भी मिल गया, लेकिन इसके बाद भी वह बैंक के कर्जदार बने रहे। उन पर बैंक का चार हजार रुपये बकाया है। इसी गांव के आद्या प्रसाद पर आठ हजार तथा गोविंद शंकर पर भी छह हजार रुपये बैंक का कर्ज बना हुआ है। अब बैंक वाले उनसे यह कर्ज चुकता करने के लिए दबाव बना रहे हैं। अन्यथा, वे बैंक के डिफाल्टर बने रहेंगे। यह केवल एक गांव के तीन किसानों का दर्द नहीं है।
जिले में हजारों किसान हैं, जो ऋण मोचन योजना का लाभ पाने के बावजूद बैंक के कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं। मुश्किल यह कि बैंक के अफसर शेष राशि के बारे में स्पष्ट तौर पर कुछ बता भी नहीं रहे हैं। बस शेष राशि जमा कराके कर्ज का खाता बंद कराने के लिए दबाव बना रहे हैं। इतना ही नहीं मामला सीधा सरकार से जुड़ा होने की वजह से अफसर इस बारे में कुछ बोलने से भी बच रहे हैं। भारतीय स्टेट बैंक के अफसर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सरकार ने 31 मार्च 2016 को आधार बनाया है। उस दिन कर्ज और ब्याज को जोड़कर किसान पर जो देनदारी बनती थी, उसे माफ कर दिया गया लेकिन माफी अब मिली है। ऐसे में बैंकों का इस दौरान का ब्याज बचा रहा जो अब वे किसान से वसूल रहे हैं। बड़ौदा पूर्वी उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक के एक अफसर का कहना है कि बैंकों के कई तरह के सर्विस चार्ज भी होते हैं, जिसे माफ नहीं किया गया है। किसानों को उसे अलग से देना होगा।
इस बारे में खाता का विवरण देखने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। इसकी कई वजहें हो सकती हैं। खाताधारक संबंधित बैंक शाखा में संपर्क करें। कर्जमाफी के बाद भी कोई देनदारी बनती है तो किसानों को देना होगा। बैंक की कार्रवाई से संतुष्ट न होने वाले किसान शिकायत कर सकते हैं। -रामजी, अग्रणी बैंक प्रबंधक
ऋण मोचन के बावजूद कर्जदार बने रहने से किसानों की समस्या बनी हुई है। वे अब भी बैंकों के कर्जदार बने हुए हैं। कई डिफाल्टर भी हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें नया कर्ज नहीं मिल रहा। सूखे की मार झेल रहे किसानाें को नया कर्ज नहीं मिलने से परेशानी और बढ़ गई है।