शिक्षा सेवा अधिकरण के
विरोध में हाईकोर्ट के वकील
न्यायिक कार्य का किया बहिष्कार, सीएटी में नहीं हुआ काम
मुख्य न्यायाधीश से मिले अधिवक्ता, मुख्यमंत्री को भी भेजा ज्ञापन
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। शिक्षा सेवा अधिकरण प्रयागराज के बजाय लखनऊ में बनाए जाने के विरोध में शुक्रवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट और केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के वकीलों ने न्यायिक कार्य का बहिष्कार किया। इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के आह्वान पर आयोजित बहिष्कार के कारण हाईकोर्ट में न्यायिक कार्य ठप रहा। बार एसोसिएशन के पुस्तकालय हाल में हुई बैठक के बाद अध्यक्ष के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य न्यायाधीश गोविन्द माथुर से मिलकर इस मामले पर वार्ता की। वकीलों ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों ने लखनऊ में रहने के अपने मोह के कारण अधिकरण लखनऊ ले जाने का निर्णय लिया है।
बैठक की अध्यक्षता राकेश पांडेय और संचालन महासचिव जेबी सिंह ने किया। बैठक में मुख्य न्यायाधीश, मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्रियों को ज्ञापन भेजने का निर्णय लिया गया। 10 अगस्त को एक प्रतिनिधिमंडल उप मुख्यमंत्री एवं उच्च शिक्षा मंत्री दिनेश शर्मा से मिलकर ज्ञापन सौंपेगा। मुख्य न्यायाधीश से मिलने गए प्रतिनिधिमंडल में पूर्व अध्यक्ष राधाकांत ओझा, पूर्व अध्यक्ष आईके चतुर्वेदी, पूर्व महासचिव प्रभा शंकर मिश्र, अशोक सिंह, सीपी उपाध्याय, एसी तिवारी एवं एससी पांडेय शामिल थे।
संयुक्त सचिव प्रेस सर्वेश दूबे ने बताया कि बार की सभा में वरिष्ठ उपाध्यक्ष अखिलेश कुमार मिश्र गांधी सहित सभी पदाधिकारीगण और बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ लखनऊ में अधिकरण स्थापित करने का विरोध किया। अविनाश वर्मा, अजय कुमार मिश्र, संतोष मिश्र, अतुल पांडेय, बीडी पांडेय, राजेश त्रिपाठी, समाजवादी अधिवक्ता सभा के राष्ट्रीय महासचिव विनय प्रताप सिंह यादव आदि ने मुख्यमंत्री से अपील की है कि न्यायिक मापदंडों के तहत ही अधिकरणों का गठन करें और उनमें योग्य वकीलों और पूर्व जजों की नियुक्ति की जाए। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के वकीलों ने भी विरोध स्वरूप न्यायिक कार्य नहीं किया। यह जानकारी बार के उपाध्यक्ष जितेंद्र नायक ने दी है।
जहां हाईकोर्ट हो वहीं बनना चाहिए अधिकरण
- शिक्षा अधिकरण का संविधान में नहीं है प्रावधान
प्रयागराज। सेंटर फॉर सोशल एंड कांस्टीट्यूशनल रिफार्म के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता एएन त्रिपाठी ने कहा है कि जहां हाईकोर्ट हो वहीं पर अधिकरण स्थापित किए जाने चाहिए। उन्होंने शिक्षा सेवा अधिकरण के गठन को असांविधानिक बताया और कहा कि 42 वें संविधान संशोधन से अधिकरण के गठन के उपबंधों को संविधान में जोड़ा गया। अनुच्छेद 323 ए में प्रशासनिक अधिकरण गठित करने का अधिकार संसद के जरिये केंद्र सरकार का है और अनुच्छेद 323 बी के तहत अन्य मामलों में अधिकरण गठित करने का अधिकार राज्य सरकार को दिया गया है। इस अनुच्छेद में शिक्षा को शामिल नहीं किया गया है। टीएमए पई केस में सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा अधिकरण के गठन को लेकर टिप्पणी की है। अनुच्छेद 21 ए में शिक्षा को मूल अधिकार में शामिल किया गया है। अध्यापक सरकारी सेवक नहीं है किंतु लोक कार्य करते हैं। शिक्षा का दायित्व राज्य का है, ऐसे में अध्यापकों को सिविल वाद या अधिकरण में उलझाने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए। अध्यापकों के मामले में याचिका ही उपचार होना चाहिए। अध्यापक और राज्य का मालिक और नौकर का रिश्ता नहीं है। इसलिए अधिकरण का गठन गैर कानूनी है।