राजस्थान में लोकायुक्त की पहल पर एक आईएएस के घर छापे में आवास से करोड़ाें रुपये की संपत्ति मिली। इससे पहले आंध्र प्रदेश में आईएएस अधिकारी (डिप्टी ट्रांसपोर्ट कमिश्नर) के घर पर एंटी करप्शन ब्यूरो की टीम की छापेमारी में आठ सौ करोड़ रुपये की संपत्ति मिली थी। वहीं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव के पास एक हजार करोड़ रुपये की अघोषित संपत्ति मिली। उत्तर प्रदेश में आईएएस एसोसिएशन ने ही मुख्य सचिव रहे एक अन्य अफसर को सबसे भ्रष्ट आईएएस चुना था। ये उदाहरण बताने के लिए काफी हैं कि भ्रष्टाचार की जडे़ं काफी गहरे तक गई हैं और इसमें लिप्त आईएएस अफसरों की फेहरिस्त लंबी है।
भ्रष्टाचार में लिप्त अफसरों को लेकर देश भर में छिड़ी बहस के बीच बीते दिनों घोषित सिविल सेवा भर्ती के परिणाम के बाद आईएएस अफसरों को मिले असीमित अधिकार और शून्य जवाबदेही वाली अंग्रेजों के समय से चली आ रही व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। शहर के बीचो बीच अफसरों को मिले बंगले और उनकी शानो-शौकत गुलामी के घाव को और कुरेदती है। यह सवाल लगातार उठता रहा है कि इंजीनियरिंग, मेडिकल, सेना जैसे विशेषज्ञ क्षेत्रों में एक आईएएस नीति निर्धारण का काम कैसे कर सकता है। प्रशासनिक अफसराें के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की बढ़ती प्रवृत्ति के बीच यह सवाल और मुखर हो गया है। भारत रत्न पूर्व राष्ट्रपति डॉ.अब्दुल कलाम ने भी कहा था ‘अपने देश में आईएएस अफसरों की जरूरत नहीं है।’ अलग-अलग क्षेत्र के जानकार दो टूक कहते हैं, वर्तमान व्यवस्था में आईएएस का व्यवहार शासक जैसा हो गया है जबकि , किसी विभाग मेंउसका दायरा सिर्फ व्यवस्था प्रबंधन तक सीमित होना चाहिए। अमेरिका समेत कई देश में मुखिया विभाग का ही होता है। ऐसे पद उनके सहयोग के लिए होते हैं।
उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति तथा राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एमपी दुबे कहते हैं, यहां ब्रिटिश काल की व्यवस्था चली आ रही है। पूरी ताकत सिविल सर्वेंट को दे दी गई है। इनके पास सारी सुविधाएं भी आ जाती हैं। शिक्षा, हेल्थ, इंजीनियरिंग सभी क्षेत्र में नीति आईएएस बनाएगा। संबंधित विभाग के विशेषज्ञ उसका पालन करेंगे जबकि, अमेरिका में सिविल सर्वेंट इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं। प्रोफेशन को महत्व दिया गया है। कई साल पहले आर्मी के लोगों ने इस व्यवस्था का तीव्र विरोध किया था। उनकी मांग थी कि उनसे जुड़े फैसले सेना के लोग ही लें। अन्य विभागों की ओर से भी समय-समय पर इस तरह की मांग उठती रही है लेकिन सरकार को भी वर्तमान व्यवस्था रास आती है। राज्य सरकारें पॉवर का विकेंद्रीकरण करना नहीं चाहतीं। आईएएस के सहारे पूरा पॉवर अपने पास रखना चाहती हैं। इसके अलावा आईएएस एसोसिएशन भी काफी मजबूत है।
प्रोफेसर दुबे कहते हैं, आईएएस की भूमिका एक सेवक के रूप में होनी चाहिए। प्रमुख सचिव, सचिव के पद पर संबंधित विभाग के वरिष्ठतम अफसर की नियुक्ति होनी चाहिए। आईएएस की नियुक्ति इनके सहयोग के लिए होनी चाहिए। सबसे अहम है कि पंचायताें के अधिकार बढ़ाए जाएं। करप्शन पर रोक लगनी चाहिए। इसके लिए पर्याप्त कानून हैं, उन्हें प्रभावी बनाने की जरूरत है। इंडियन इंजीनियर्स फेडरेशन के पूर्व चेयरमैन आरएम सक्सेना कहते हैं, सारे अधिकार आईएएस को दे दिए गए हैं लेकिन उनकी कोई जवाबदेही नहीं है। गड़बड़ी पर आईएएस की जवाबदेही तय नहीं होती। यह मांग अब भी जारी है कि मुखिया विभाग का ही वरिष्ठ अफसर हो। इनके ऊपर सिर्फ मुख्य सचिव हो। महाराष्ट्र और गुजरात में सचिव और एचओडी एक ही होता है। विभाग के सबसे वरिष्ठ अफसर के पास यह जिम्मेदारी होती है। मध्य प्रदेश में भी इंजीनियर ही सेक्रेटरी बनता है, हालांकि इन पर नियंत्रण के लिए एक आईएएस को भी बिठा दिया गया है।
विरोध के बावजूद योजना के तहत आईएएस के पॉवर बढ़ते चले गए। पहले डायरेक्टर ऑफ हेल्थ, इंजीनियर इन चीफ ही विभाग का सबकुछ होता था। बाद में यह व्यवस्था बदल दी गई। 1969 में सीडीओ की नियुक्ति का निर्णय लिया गया। वह डीएम के अंडर में नहीं होता था। सीडीओ विकास कार्यों से जुड़े विभाग का अफसर होता था। पहली बार पूरे प्रदेश में दो सीडीओ की नियुक्ति हुई थी। 1985 से पहले सचिव को किसी विभाग के अफसर का चरित्र प्रमाणपत्र लिखने का अधिकार नहीं था। पूर्व में हर विभाग में सेक्रेटरी विभाग का अफसर ही होता था। 1984 में केंद्र में कुल 101 सचिव थे। इनमें से 51 नॉन आईएएस थे लेकिन धीरे-धीरे सभी अधिकार आईएएस के हाथ में चले गए।