झूंसी में रेलवे की 41 बीघा जमीन का फर्जीवाड़ा कर दूसरे के नाम बेचने के मामले में नया खुलासा हुआ है। इस जमीन को एडीए खरीदकर डुप्लेक्स बनाने की तैयारी में था। डीएम की अध्यक्षता में कमेटी भी बना दी गई। हालांकि इसी दौरान गड़बड़ी का खुलासा हुआ और एडीए ने हाथ खींच लिए। करीब दो साल पहले 2016 में इस मामले के खुलने के बावजूद फर्जीवाड़े को रेलवे और प्रशासनिक अधिकारी दबाए रहे। जब एडीए ने जमीन नहीं ली तो इसकी प्लाटिंग कर बेचने की तैयारी की गई। विरोध हुआ तो अधिकारियों ने अपने को बचाते हुए फिर से इस जमीन को राजस्व अभिलेखों में रेलवे के नाम दर्ज करा दिया।
बनारस से आए पूर्वोत्तर रेलवे के सीनियर डिवीजन इंजीनियर भारत भूषण श्रीवास्तव ने गुुरुवार को एसपी क्राइम के सामने रेलवे का पक्ष रखा। इस दौरान रेलवे, एडीए और राजस्व विभाग की ओर से हुए पत्राचार का ब्योरा भी पेश किया। उसी में यह खुलासा हुआ है। इस मिलीभगत में रेलवे के रिटायर्ड सीनियर सेक्शन इजीनियर जय शंकर मिश्रा की राजस्व अधिकारियों के साथ बिल्डर और राजस्व अधिकारियों से मिलीभगत रही है। उन्हें भी 25 अक्तूबर को तलब करने के लिए क्राइम ब्रांच ने नोटिस जारी किया है।
इस जमीन को कब्जाने के लिए बिल्डर पर्दे के पीछे रहे। उन्होंने चंदोहा के कुतुबुद्दीन और सलाउद्दीन से एसडीएम की अदालत में आवेदन करा दिया कि कटका में रेलवे की जमीन के पास दो हिस्सों में बंटी जमीन हमारे पूर्वजों की है। उधर रेलवे के सीनियर सेक्शन इंजीनियर को भी इस साजिश में शामिल कर लिया गया। एसडीएम फूलपुर रहे बदायूं के सिटी मजिस्ट्रेट राज कुमार द्विवेदी ने इस जमीन को लेकर रेलवे के सेक्शन इंजीनियर और सीनियर सेक्शन इंजीनियर को पत्र लिखकर औपचारिकताएं पूरी कर लीं। इन दोनों अधिकारियों ने इन पत्र का कोई जवाब नहीं दिया। उसी के बाद यह जमीन कुतुबुद्दीन और सलाउद्दीन के नाम कर दी गई।
कुछ दिनों के बाद एडीए से इस जमीन को बेचने पर बात हुई। एडीए ने बोर्ड बैठक में प्रस्ताव पारित कराकर डुप्लेक्स बनाने के लिए काश्तकार से 12 से लेकर 20 हजार रुपये वर्गमीटर सर्किल रेट में सीधे खरीदने का निर्णय ले लिया। इसके लिए डीएम की अध्यक्षता में कमेटी भी बनाई गई। रेलवे के सेक्शन इंजीनियर से लेकर डीआरएम बनारस और जीएम गोरखपुर को पत्र लिखकर एनओसी मांगी गई। उसी दौरान रहीश नाम के व्यक्ति की ओर से एडीए को भेजे गए पत्र में खुलासा हुआ कि यह जमीन रेलवे की है। इसमें पर्दे के पीछे बिल्डर हैं, उन्होंने राजस्व अधिकारियों से सांठगांठ करके कई अरब रुपये की इस जमीन को दो लोगों के नाम करा दी है। इस पत्र के बाद अफसरों ने जमीन को खरीदने का प्रस्ताव निरस्त कर दिया।
फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ तो प्रशासनिक और राजस्व अधिकारियों ने रेलवे के आवेदन का इंतजार नहीं किया। अपनी ओर से तुरंत इस जमीन को रेलवे के नाम कर दिया। डीएम की ओर से इस बारे में रेलवे के दोषी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई के लिए डीआरएम को पत्र लिखा गया लेकिन रेलवे के अफसरों की ओर से इस प्रकरण में कोई कार्रवाई नहीं की गई।
‘एडीए इस जमीन पर डुप्लेस बना रही थी। एनओसी के लिए रेलवे के जीएम को कई पत्र लिखे गए थे। उनका जवाब तो नहीं मिला लेकिन एक शिकायती पत्र से खुलासा हुआ कि यह जमीन रेलवे की है। उसी के बाद इस प्रस्ताव को निरस्त कर दिया गया। अन्यथा एडीए की रकम इस योजना में डूब जाती।’ वंदना त्रिपाठी, पूर्व सचिव एडीए
‘25 अक्तूबर को फिर से रेलवे को अफसरों को विस्तृत जानकारी के लिए नोटिस दे दिया गया है। इस दिन उन दिनों सेक्शन और सीनियर सेक्शन इंजीनियर रहे दो अफसरों को भी साक्ष्य का साथ बुलाया है। इस मामले में 13 अक्तूबर को सीआरओ, एसडीएम फूलपुर और तहसीलदार को साक्ष्य और बयान दर्ज करने के लिए क्राइम ब्रांच में बुलाया है।’ बीके मिश्रा, एसपी क्राइम