इलाहाबाद। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक आदेश से सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (सीजीएचएस) के तहत किडनी का इलाज करा रहे मरीजों की जान सांसत में पड़ गई है। मरीजों को उस आदेश का इंतजार है, जब किडनी की ब्रांडेड और महत्वपूर्ण दवा पर लगी रोक हटे और उन्हें बाहर से दवाएं खरीदने के लिए मजबूर न होना पड़ा। मरीजों को उम्मीद है कि जिस तरह डायबिटीज की महत्वपूर्ण दवाओं एवं इंसुलिन पर लगी रोक हटा ली गई, उसी तरह उनकी दवाएं भी बहाल कर दी जाएंगी लेकिन यह राहत कब मिलेगी, किसी को मालूम नहीं। सबको इस मामले में गठित तकनीकी कमेटी के फैसले का इंतजार है।
सीजीएचएस में केंद्रीय कर्मचारियों, पेंशनरों और उनके आश्रितों को मुफ्त इलाज एवं दवाओं की सुविधा मिलती है लेकित गत दिनों स्वास्थ्य मंत्रालय ने आदेश जारी कर दिया कि विशेषज्ञों की ओर से लिखी गईं जो दवाएं सीजीएचएस की फॉर्मुलरी में हैं या उनके समान सॉल्ट वाली दूसरी दवाएं फॉर्मुलरी में हैं, वही दवाएं मरीजों को दी जाएं। ऐसे में तमाम महत्वूपर्ण दवाओं का वितरण रोक दिया गया। आदेश पर विवाद बढ़ा तो सीजीएचएस के अपर निदेशक मुख्यालय नई दिल्ली की तरफ से डायबिटीज के मरीजों के लिए प्रतिबंधित की गईं दवाओं को बहाल कर दिया गया लेकिन किडनी के मरीजों की संख्या कम होने के कारण इनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया जबकि किडनी की दवा भी काफी महंगी जाती है। किडनी के ज्यादा मरीजों को ‘सेवलामर-400 एमजी’ या ‘सेवलामर-800 एमजी’ वाले फार्मूले की दवा दी जा रही थी लेकिन सीजीएचएस की फार्मुलरी में यह फार्मूला न होने के कारण इस फार्मूले की दवाओं का वितरण रोक दिया गया जबकि इस फार्मूले की दवाएं काफी महंगी आती हैं। इलाहाबाद में ही सीजीएचएस में किडनी के 100 से अधिक मरीज इलाज करा रहे हैं। दवा का वितरण रुक जाने से मरीजों के लिए मुसीबत खड़ी हो गई है और उन्हें बाजार से दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक जिन मरीजों को डायबिटीज और ब्ल्डप्रेशर दोनों बीमारी है, उनमें किडनी की बीमारी होने की सर्वाधिक संभावना होती है। ऐसे में सीजीएचएस प्रशासन को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए और किडनी के मरीजों की दवाएं भी बहाल कर देनी चाहिए।