इलाहाबाद। शरई अदालतों के बारे में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर सभी ने सहमति जताई है लेकिन शहर काजी से लेकर इमामे जुमा तक, सभी का मानना है कि इन अदालतों को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। इनकी अपनी अहमियत है और ये बड़ी अदालतों पर पड़ने वाले मुकदमों के बोझ को काफी कम करती हैं।
दरअसल शरई अदालतों या दारुल कजा के फैसले, दोनों पक्षों को सुनने और उनकी रजामंदी से होते हैं। जब दोनों ही पक्ष इस बात पर राजी होते हैं कि अल्लाह और रसूल का जो भी फैसला होगा, उसे सच्चे दिल से मानेगें, तभी फैसला सुनाया जाता है। उसे उन पर थोपा नहीं जाता है। माना जाता है कि जो उस पर अमल नहीं करता, आखिरत में उसे उसके गुनाहों की सजा मिलेगी।
शहर काजी मुफ्ती शफीक अहमद शरीफी के मुताबिक जुमेरात को दर्जन भर से ज्यादा ऐसे फैसले किए जाते हैं जो शरई दायरे के भीतर होते हैं। आज भी मुसलमान अपने मसले सुलझाने केलिए शरई अदालतों में आते और संतुष्ट होकर लौटते हैं। यहां बड़ी संख्या में मसले हल किए जाते हैं जिससे बड़ी अदालतों का बोझ कम होता है।
नायाब शहर काजी मौलाना मुजाहिद हुसैन रजबी ने कहा, मुसलमानों के फैसले मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक ही हल किए जाने चाहिए और शरई अदालतें इसी दायरे में रहकर काम करती हैं। वहीं फतवा भी वह कानून है, जो कुरान या हदीस से निकलता है। इसके जरिये यह बताया जाता है कि क्या हलाल है और क्या हराम, क्या वाजिह है, क्या फर्ज।
शिया जामा मस्जिज चक के इमाम जुमा व जमात सैयद हसन रजा ने कहा कि यदि सभी लोग अपने सभी मुद्दों को लेकर अदालतों में चले जाएं तो उनका बोझ काफी बढ़ जाएगा। शरई अदालतों में आलिम, काजी या इमामे जुमा के पास बड़ी संख्या में मसले हल हो जाते हैं, नहीं तो वे भी बड़ी अदालतों में पहुंचते।