इलाहाबाद। धर्म, आस्था या फिर राजनीति के नाम पर ही सही गंगा-यमुना को बचाने के लिए समय-समय पर हर ओर से आवाज उठी। हर किसी ने अपने तरीके से अभियान में भागीदारी निभाई, लेकिन इसी जिले में लाखों लोगों की लाइफ लाइन बनीं आधा दर्जन से अधिक छोटी नदियों की ओर किसी ने देखा तक नहीं। उपेक्षा का नतीजा रहा कि अब इनके अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगा है। उनका वजूद धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। कहीं बालू और पत्थर खनन ने सूरत बिगाड़ दी तो कहीं अतिक्रमण और गंदगी ने इन नदियों को नाले में तब्दील कर दिया। पानी इतना प्रदूषित हो चुका है कि हर दिन बीमारी जन्म ले रही है। इलाहाबाद के सुदूर इलाके में हजारों लोगों की जिंदगी को सींचने वाली ये नदियां कभी भी चुनाव में नेताओं का मुद्दा नहीं बन सकीं।
नदियों को कैसे बचाया जा सकता है, इसके दो बड़ उदाहरण हमारे सामने हैं। पूरे देश ने उनके जज्बे का लोहा माना, लेकिन शायद सबक कहीं किसी ने नहीं लिया। राजस्थान में बहने वाली अलवरी नदी पूरी तरह से सूख गई थी। जल बिरादरी के संयोजक राजेंद्र सिंह राणा ने ग्रामीणों की मदद से जलग्रहण प्रबंधन मिशन के तहत काम करना शुरू किया और उसे फिर से नई जिंदगी दे दी। अब बारहों महीने नदी में पानी रहता है। पंजाब में संत बलवीर सिंह सींचेवाल ने बेई नदी को निर्मल करने का बीड़ा उठाया। अथक प्रयास और फौलादी जज्बात से उन्होंने कुछ महीनों में ही बेई नदी की तस्वीर बदल दी। इलाहाबाद में भी दम तोड़ रहीं इन नदियों को भी बचाया जा सकता है। उन्हें संवारा जा सकता है, लेकिन राजेंद्र सिंह राणा और बलवीर सिंह सींचेवाल कहां से आएंगे!
मध्यप्रदेश में सतना जिले के कैमूर पहाड़ी से निकली टोंस नदी मेजा के सिरसा में आकर गंगा में मिल गई है। दर्जनों पहाड़ी गांवों के लोग छह महीने से भी ज्यादा समय तक इसी के पानी से अपनी प्यास बुझाते हैं, लेकिन बेहिसाब खनन ने इसकी सूरत बिगाड़ दी है। नदी के किनारे बसे कोना, बरसैता गांव के विनय शुक्ल, नागेश्वर, रामशिरोमणि दूबे, रामप्यारे आदि बताते हैं कि वे पेयजल के साथ सिंचाई के लिए भी टोंस नदी पर ही निर्भर हैं। गर्मियों में तो बगैर इसके जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन अवैध तरीके से बालू खनन से इसका स्वरूप ही बदल गया है।
गंगापार में बहरिया के उत्तरी छोर पर प्रतापगढ़ की सीमा से लगे उमरन ताल से निकली मनसैता नदी लगभग खत्म हो गई है। अब लोग भी इसे मनसैता नदी की बजाए मनसैता नाला कहते हैं। यह नदी कभी हजारों एकड़ में फैले ताल की एक शृंखला बनाती थी, लेकिन लगातार कटान और झाड़-झंखाड़ के कारण यह नदी खुद नाला बन गई। सिकंदरा के अमरनाथ मिश्र, डा. शिवकुमार केसरवानी बकसेड़ा के हीरालाल पाल बताते हैं कि पहले नदी में सालभर पानी रहता था, लेकिन अब सिर्फ बरसात में ही पानी दिखता है।
मध्यप्रदेश के रीवा जिले के गोपला गांव से निकली गोरमा नदी इलाहाबाद में हिरिया गंथा के पास नैना नदी में मिल जाती है। इसके किनारे बसे हंड़िया, ककरहा, बसहा, मानपुर, चंदापुर, चिरांव, गड़रपुरवा, बहरैचा, पथरैहा आदि गांवों के लोग लगातार घटते जलस्तर से परेशान हैं। पहाड़ी इलाके से गुजरने वाली इस नदी में पत्थर और बालू का खनन जोरों पर है। हंड़िया के प्रधान योगेंद्र प्रताप सिंह, श्याम बिहारी सिंह पटेल, चिरांव निवासी पर्यावरण शिक्षक सुरेश कुमार कुशवाहा आदि बताते हैं कि खनन के कारण ही नदी और आसपास के इलाके में जलस्तर तेजी से घट रहा है।
कोरांव में अतरेजी जंगल में पनिहा नाला से निकली टुड़ियारी नदी खिवली खुर्द में आकर बेलन नदी में मिल जाती है। गर्मी आते ही यह नदी सूख जाती है। आसपास के गांवों के लोग कूड़ा-करकट ले जाकर फेंक देते हैं। इससे नदी पूरी तरह-तरह प्रदूषित है।
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बेलन को मदद की दरकार
मिर्जापुर के बरौंधा से निकली बेलन नदी खीरी क्षेत्र के गौरा में टोंस नदी में मिल जाती है। अयोध्या, देवघाट, बांस, लखनपुर, लौवाकोन, भोगन, टुड़ियार, खिवली, बरहा मटियार, पथरपुर आदि गांवों के किसान सिंचाई के लिए इस नदी पर ही आश्रित हैं। इससे तीन नहरें भी निकली हैं। खनन से इसका भी बुरा हाल है। भोगन के पूर्व प्रधान मालिकराम सिंह बताते हैं अगर खनन पर रोक नहीं लगी तो दर्जनों गांवों में पीने के पानी का संकट खड़ा हो जाएगा।
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लपरी में फेंके जाते हैं मरे जानवर
मांडा में पहाड़ से निकली लपरी नदी खरका गांव के समीप टोंस में मिल जाती है। प्रदूषण से इसका भी बुरा हाल है। लोग मरे जानवर फेंक देते हैं। पहले लोग पंपिंगसेट लगाकर सिंचाई करते थे, लेकिन अब नदी जगह-जगह नाले के रूप में तब्दील होती जा रही है। जमुआं, मझिगवां, किहुनी, पंवारी, कोबरी, धोबहट, भगवानपुर, मोजरा, बहरैचा, गड़री आदि गांवों के किसान सिंचाई के लिए इस पर निर्भर हैं। खोंचा के गंगा प्रसाद तिवारी बताते हैं कि लपरी नदी में जगह-जगह नाला होता जा रहा है। चेकडैम बनाने की जरूरत है।
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वरुणा पर किसी ने नहीं दिखाई करुणा
फूलपुर के मैलहन गांव में ताल से निकलकर जौनपुर, भदोही होते हुए बनारस में गंगा से मिलने वाली वरुणा नदी की भी कहानी बेहद दुखद है। फूलपुर और हंडिया के सैकड़ों गांव इसके किनारों पर बसे हैं। कुतुबपुर, मैलहन, लतीफपुर, सराय हरीराम आदि गांवों में पहले नदी काफी चौड़ी थी, लेकिन अब कई जगहों पर सिकुड़ गई है। वरुणा पुल के आसपास सिर्फ जलकुंभी है नदी में। भारतीय किसान यूनियन ने शमीम हाशमी और फसल क्षतिग्रस्त किसान कल्याण समिति के नेतृत्व में नदी की सफाई के लिए कई बार आंदोलन किया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। पांच साल पहले शासन से डेढ़ करोड़ खोदाई के लिए मिले थे, लेकिन कुछ दूर काम कराके छोड़ दिया गया। मात्र दस किमी तक नदी में खोदाई हुई। इफको ने भी प्रयास किया, लेकिन बात नहीं बनी।