इलाहाबाद। माघ मेले के तहत वैसे तो संगम की रेती पर जगह-जगह अन्नक्षेत्र, भोजन, भंडारा का क्रम जारी है लेकिन वसंत पंचमी पर संगम की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित वाहिगुरु के शिविर में नारायण सेवा का नजारा अलग रहा। ‘वाहि गुरु’ के अन्नक्षेत्र में नाश्ते के अतिरिक्त सुबह और शाम के प्रसाद की व्यवस्था है। वसंत पर बेरोकटोक शिविर पहुंचने वाले साधुओं का पूरी श्रद्धा एवं सेवाभाव से पांव पखारने से लेकर भोजन कराने और दक्षिणा देने का सिलसिला पूरे समय जारी रहा। तय वक्त पर भोजन प्रसाद लेने वालों में संत-दंडी संन्यासी, फक्कड़, फकीर से लेकर महिलाओं की टोली और सेवाकार्य में लगे अनेक कर्मचारियों के अतिरिक्त अमेरिका से आए स्वामी परमानंद भी शामिल थे।
भोजन के साथ ही बिना भेदभाव साधुओं को समान रूप से दक्षिणा देने का क्रम भी जारी रहा। इस बीच शिविर संचालक संत हरबंस साहिब साधुओं का स्वागत और अनुरोध करते रहे, ‘जूठी थाली दीजिए, नए नोट लीजिए।’ सेवाकार्य में तकरीबन सौ से ज्यादा सेवकों की टोली निष्ठाभाव से जुटी रही। खास यह कि आस्ट्रेलिया के सत्येंद्र ओझा, न्यू जर्सी के कमल कश्यप सहित अनेक विदेशी सेवकों ने भी थालियां साफ करने से लेकर पंगत को परोसने तक की सेवा की। ‘वाहि गुरु’ का भंडारा माघी पूर्णिमा तक जारी रहेगा।
जीरो रोड स्थित चक्रेश्वरी देवी मंदिर का वार्षिकोत्सव मंगलवार को श्रद्धापूर्वक मनाया गया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच देवी का पूजन अर्चन किया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी देवी की महिमा बखानी गई। सोमनाथ बोरा एवं साथियों की ओर से प्रस्तुत बीहू नृत्य की प्रस्तुति लुभावनी रही। कार्यक्रम में मनकामेश्वर मंदिर के महंत स्वामी श्रीधरानंद ब्रह्मचारी, विशाल पाठक, डॉ.कृष्णानंद पांडेय सहित अनेक श्रद्धालु मौजूद थे। राकेश सिन्हा ने कार्यक्रम का संचालन किया।
गणपति नारायण मत के साधक भानु प्रताप नारायण मिश्र का मानना है कि माघ मेेले के दौरान गणपति की आराधना विशेष फलदायी होती है। गणपति सभी विघ्नों को दूर करने वाले हैं, उनकी प्रसन्नता के बाद ही नारायण का आशीष मिलेगा। वैष्णवबाड़ा में उन्होंने वसंत पर गणपति नारायण का बखान किया। कहा, गंगा में स्नान के बाद उत्तर की ओर मुंह करके गणपति को 21 बार जलांजलि फलदायी होगी। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी पर गणपति आराधना से धन प्राप्ति जबकि कृष्ण पक्ष की चतुथी पर पूजन से सभी प्रकार के कष्टों का नाश होता है। गणपति की तरह ही माता-पिता को लेकर कल्पवास करने का फल भी कई गुना होता है।