इलाहाबाद। आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर (एएसडी) पर एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन कामडील ट्रस्ट बंगलूरू एवं मोतीलाल नेहरू मेडिकल कालेज की मनोरोग इकाई द्वारा संयुक्त रूप से किया गया, जिसमें देश के नामचीन मानसिक रोग विशेषज्ञों ने व्याख्यान दिया। सेमिनार का मुख्य उद्देश्य आटिज्म से पीड़ित बच्चों की पहचान एवं उनके उपचार की जानकारी देना था। सेमिनार में बंगलूरूकी विशेषज्ञ डॉ. दीपा भट्ट नायर ने कहा कि आटिज्म बीमारी से ग्रसित बच्चों में अभिव्यक्ति की क्षमता बेहद कम होती है। ऐसे बच्चों को बातचीत करने में भी परेशानी होती है।
जहां तक देश में आटिज्म से पीड़ित बच्चों का सवाल है तो जनसंख्या के एक प्रतिशत बच्चे इस बीमारी से पीड़ित हैं। नायर ने कहा कि वैज्ञानिक शोधों से यह बात सामने आयी है कि आटिज्म लड़कियों की तुलना में लड़कों में तीन गुना ज्यादा पाया जाता है। बच्चे के जन्म लेने के पहले वर्ष में ही इस बीमारी के लक्षण नजर आने लगते हैं। जबकि तीन वर्ष की उम्र तक इसे आसानी से पहचाना जा सकता ह्रै। आटिज्म से पीड़ित बच्चे देर से बोलते हैं। उनके चेहरे पर अभिव्यक्ति बेहद कम दिखायी देती है। ऐसे बच्चे बहुत कम ही लोगों से मिलजुल पाते हैं, जहां तक इलाज का सवाल है तो18 से 36 माह के भीतर यदि बीमारी की पहचान कर विशेषज्ञ से मदद ले ली जाए तो काफी हद तक स्थिति पर काबू पाया जा सकता है। आटिज्म से पीड़ित 50 फीसदी बच्चे मानसिक तौर पर बेहद कमजोर पाए गए हैं।
सेमिनार में सांसद रेवती रमण सिंह, विधायक गिरीश पांडेय, मेडिकल कालेज के प्रधानाचार्य डॉ. एसपी सिंह, एसआरएन की सीएमएस एवं प्रो. श्रद्धा द्विवेदी, मेडिसिन विभाग की अध्यक्ष डॉ. सरिता बजाज, मानसिक रोग विशेषज्ञ प्रो. एके टंडन, डॉ. वीके सिंह, डॉ. क्षितिज श्रीवास्तव, डॉ. अनुराग वर्मा, डॉ. अभिनव टंडन समेत कई चिकित्सक उपस्थित थे।