इलाहाबाद। न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त नहीं रहे। लंबी बीमारी के बाद बुधवार की शाम टैगोर टाउन स्थित आवास पर उन्होंने अंतिम संास ली। पखवारे भर पहले दिल का दौरा पड़ने पर उन्हें एसआरएन अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। वह 83 वर्ष के थे। वह अपने पीछे पत्नी, तीन बेटे, बहुओं, पोते-पोतियों से भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं। पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक उनकी शवयात्रा बृहस्पतिवार को उनके टैगोर टाउन स्थित आवास से दोपहर बारह बजे रसूलाबाद घाट के लिए रवाना होगी जहां उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनके निधन की सूचना मिलते ही उन्हें अंतिम प्रणाम कहने के लिए उनके आवास पर न्यायमूर्तियों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों का तांता लग गया।
कानून और साहित्य के क्षेत्र को समान रूप से समृद्ध करते हुए न्यायमूर्ति गुप्त आजीवन हिन्दी की सेवा में जुटे रहे। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की ओर से हिन्दी गौरव सम्मान में मिली राशि के योगदान से उन्होंने इटावा हिन्दी सेवा निधि न्यास की स्थापना की थी। इससे प्रत्येक वर्ष हिन्दी सेवियों को जनवाणी सहित अन्य सम्मान दिए जाते रहे। हिन्दी की सेवा के लिए ही संयुक्त राष्ट्र संघ के आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में उन्हें सम्मानित किया गया था।
हिंदी उनके व्यक्तित्व का एक हिस्सा रहा। वह ऐसे न्यायाधीश थे, जिन्होंने पद ग्रहण के समय ही तय कर लिया था कि जनभाषा में ही जनता को न्याय देना है। हिंदी में उनकी ओर से दिए गए चार हजार से अधिक फैसले आज भी नजीर की तरह हैं। इसके लिए उन्होंने अथक प्रयास भी किया। शासकीय अधिवक्ता के तौर पर भी उन्होंने जनपद न्यायालय से हिंदी का प्रयोग शुरू किया था। हाईकोर्ट में मृत्युदंड के एक मामले में अपील पर बहस के दौरान उन्होंने अदालत से हिंदी में बहस की अनुमति मांगी और जब बहस पूरी हुई तो न्यायाधीश भी चकित रह गए। उन्हें हिंदी में दिए गए फैसलों के लिए कई सम्मान मिले। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ ने वर्ष 2003 में डाक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया। 1992 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने उन्हें हिंदी गौरव सम्मान से नवाजा था।
जनवरी 1951 में प्लीडर नियुक्त, 1962 में एडवोकेट, इटावा जिला न्यायालय से वकालत प्रारंभ की। 1964 में जनपद शासकीय अधिवक्ता फौजदारी बने। 1971 में हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की। 1971 में हाईकोर्ट में उपशासकीय अधिवक्ता, 1973 में लखनऊ पीठ के शासकीय अधिवक्ता और 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में शासकीय अधिवक्ता बनाए गए। केंद्र सरकार की ओर से सीबीआई के विशेष अधिवक्ता भी रहे। वह वर्ष 1977 में न्यायाधीश बने और 1992 में रिटायर हुए। दो बार हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश भी रहे।