शहीद पुलिसकर्मियोें के आश्रितों से भी भेदभाव
0 मुआवजा और नौकरी देने में विभाग करता है पक्षपात
0 हाईकोर्ट ने मांगा है दस साल का ब्यौरा, पांच साल से टरका रही सरकार
योगेंद्र मिश्र
इलाहाबाद। ड्यूटी पर जान गंवाने वाले शहीद पुलिसकर्मियों के आश्रित विभागीय भेदभाव के शिकार हैं। इनको राहत और सहायता देने में हो रहे पक्षपात पर हाईकोर्ट गंभीर है। कोर्ट ने प्रदेश सरकार को अनुकंपा नियुक्ति और आश्रितों के कल्याण से जुड़ी सभी योजनाओं का ब्यौरा उपलब्ध कराने निर्देश दिया है। पिछले दस वर्षों में ड्यूटी पर शहीद हुए पुलिसकर्मियों की संख्या, उनके आश्रितों को दी गई सहायता की जानकारी भी कोर्ट ने मांगी है। पूछा है क्या आश्रितों को सहायता देने में असमानता बरती गई है, यदि ऐसा है तो उसकी वजह क्या है। कोर्ट ने मुख्यमंत्री राहत कोष से दी जानी वाली मदद की जानकारी मांगी है। पूछा है कि क्या इसे लेकर कोई नियम है। हालांकि पांच साल पहले मांगी गई यह जानकारियां अदालत को उपलब्ध कराने में सरकार आज तक बचती आ रही है।
आश्रितों से हो रहा है भेदभाव
अंतरिक्ष सिंह और दर्जनों अन्य की याचिकाओं में मृतक आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति और दूसरी मदद में देने में भेदभाव का आरोप लगाया गया है। याचीगण के अधिवक्ता विजय गौतम ने कोर्ट को बताया कि विभाग आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति देने में पिक एंड चूज की नीति अपनाता है। आयु सीमा में मनमाने तरीके से आश्रितों को अलग-अलग छूट दी जाती है। कुंडा में शहीद हुए सीओ जियाउल हक का मामला भी उठाया गया जिसमें एक ही परिवार के दो लोगों को नौकरी दी गई। कुछ को आयु सीमा में पांच वर्ष से अधिक की छूट दी जाती है।
दस साल का ब्यौरा पांच साल से नहीं दिया
जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने इस याचिका पर 31 जुलाई 2013 को प्रदेश सरकार से दस वर्ष में ड्यूटी पर मारे गए पुलिसकर्मियों की संख्या, आश्रितों को दी गई सहायता आदि की जानकारी मांगी थी। मगर सरकार हर बार कोई न कोई बहाना बनाकर जानकारी उपलब्ध कराने से बचती आ रही है। कोर्ट के आदेश को विशेष अपील में भी चुनौती दी गई। अपील पर हाईकोर्ट ने सरकार की मांग ठुकराते हुए कहा कि उसे कोर्ट द्वारा मांगी गई जानकारी देनी होगी। यदि कोई जानकारी याचिका के विषय से संबंद्ध नहीं रखती है तो सरकार उसी पीठ के समक्ष अर्जी देकर जानकारी नहीं देने का अनुरोध कर सकती है।
संयुक्त सचिव का हलफनामा नामंजूर
विशेष अपील पर निर्णय के बाद संयुक्त सचिव गृह ने 18 सितंबर को मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति संगीता चंद्रा के समक्ष हलफनामा दाखिल किया, मगर इसमें कोर्ट द्वारा पूर्व में मांगी गई कोई जानकारी नहीं दी गई। हलफनामे को नामंजूर करते हुए पीठ ने कहा कि विशेष अपील के आदेश में सरकार को जानकारी देने से कोई छूट नहीं दी गई है। पीठ ने प्रमुख सचिव गृह को पांच अक्तूबर तक मांगी गई जानकारियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
समाज की हर अच्छी और बुरी घटना के लिए सबसे पहले पुलिस की ही आलोचना होती, मगर पुलिस की परेशानियों और अधिकारों पर कोई चर्चा तक नहीं करता। सामाजिक संगठन भी कभी पुलिस की समस्याओं को मुद्दा नहीं बनाते हैं। हम तब तक एक ईमानदार और कत्तर्व्यनिष्ठ पुलिस की अपेक्षा नहीं कर सकते हैं जबकि तक यह सुनिश्चित न करें कि उसे और उसके परिवार को जो कुछ भी मिलना चाहिए वह अविलंब और बिना उत्पीड़न के उपलब्ध हो। - जस्टिस सुधीर अग्रवाल