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40 प्रतिशत घट गई दूध की मांग, संकट में पशुपालक

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दूध की खपत में भारी कमी आई है। घरों में तो मांग कम हुई ही है, बाजार बंद होने से मुसीबत और बढ़ गई है। होटल, रेस्टोरेंट का शटर डाउन रहने से दूध के साथ पनीर, खोवा, मक्खन आदि की मांग में 30 से 40 प्रतिशत तक की कमी आई है। इसकी वजह से गांवों में सैकड़ों लीटर दूध रोजाना बर्बाद हो रहा है।
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दूध व्यवसाय के बड़े केंद्र झूंसी के बदरा सुनौटी में धंधा पूरी तरह से बंद है। होटल, रेस्टोरेंट आदि में गांवों से दूध की आपूर्ति होती है। बड़ी संख्या में दूधिये खुद दूध लाकर होटल, रेस्टोरेंट में देते हैं। इनके अलावा गांवों में स्थापित छोटी-छोटी डेयरियों के माध्यम से भी दूध, खोवा की आपूर्ति की जाती है। शहरी क्षेत्र के दूध एवं खोवा मंडी में भी भारी मात्रा में खपत होती है, लेकिन इन दिनों सबकुछ बंद है। इसका नतीजा है कि मेजा, हेता पट्टी, फूलपुर समेत पूरे जिले में फैली ज्यादातर छोटी-छोटी डेयरियां बंद हो चुकी हैं। सहसों बाजार के अमित सिंह, फाफामऊ के डेयरी संचालक मुकेश यादव का कहना है कि उनके यहां रोजाना 300 लीटर से अधिक दूध की खपत थी, लेकिन 50 प्रतिशत भी नहीं रह गया। पास ही के विनोद का कहना था कि इन दिनों अधिक मात्रा में घी बनाया जा रहा है, लेकिन इसकी भी सीमा है। इसके अलावा इसमें तत्काल पैसा नहीं मिल पाता है। ऐसे में पशुओं के लिए चारा कहां से लाया जाए।
50-60 रुपये में भी खोया नहीं ले रहे
सोरांव के पशुपालकों का कहना है कि खोवा लेने के लिए भी लोग नहीं आ रहे। लोगों में कोरोना वायरस का भय है। उनका कहना है कि पहले 150-175 रुपये प्रति किग्रा खोवा बिकता था, लेकिन अब 50 से 60 रुपये में भी कोई नहीं ले रहा।
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पैकेट वाले दूध की खपत में भी गिरावट
शहरी क्षेत्र में पैकेट वाले दूध की रोजाना 40 से 50 हजार लीटर की खपत थी, लेकिन इन दिनों मांग घट कर 25 से 30 हजार लीटर रह गई है। पराग डेयरी की बात करें तो प्रयागराज और कौशाम्बी में साढ़े छह सौ से अधिक समितियां हैं, जिनके माध्यम से रोजाना 5 से 18 हजार लीटर दूध लिया जाता है। पूरा दूध खप जाता था, लेकिन इस समय रोजाना छह से सात हजार लीटर दूध बच जा रहा है। इसी तरह से पनीर एवं मक्खन की खपत में भी 40 प्रतिशत तक कमी आई है। समस्या को इससे ही समझा जा सकता है कि पराग की समितियों को निर्देश दिया गया है कि सिर्फ पंजीकृत पशुपालकों से ही दूध लें। इतना ही नहीं मुख्यालय को भी अग्रिम भुगतान के लिए पत्र लिखा गया है। अफसरों का कहना है कि रोजाना बच रहे दूध से पाउडर, मक्खन आदि बनाए जा रहे हैं, लेकिन इससे तत्काल पैसा नहीं मिल पा रहा। ऐसे में किसानों का पैसा फंसने का डर है। इसी बाबत उन्होंने मुख्यालय को पत्र लिखकर लॉकडाउन के दौरान के लिए अग्रिम भुगतान की मांग की है। उनका कहना है कि मदद नहीं मिली तो डेरी बंद करने की नौबत आ जाएगी।
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