समय से पहले रिहा हो सकेंगे उम्रकैद की सजा काट रहे बंदी
0 शासन ने जारी की कैदियों की समय पूर्व रिहाई की नीति
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद। जेलों में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे कैदियों की समय पूर्व रिहाई को लेकर प्रदेश सरकार ने अपनी नीति घोषित कर दी है। इन बंदियों को नीति के प्रावधानों के तहत उपयुक्त पाए जाने पर प्रत्येक वर्ष गणतंत्र दिवस 26 जनवरी के मौके पर जेलों से रिहा किया जाएगा। जारी नीति के अनुसार आजीवन कारावास में दंडित सभी महिला बंदी जिन्होंने न्यूनतम 14 वर्ष से 16 वर्ष की सजा काट ली है, वे रिहाई की पात्र होंगी। जबकि, 16 से 20 वर्ष की सजा काट चुके पुरुष बंदी भी समय पूर्व रिहाई के हकदार होंगे।
शासन द्वारा घोषित नीति के अनुसार अजीवन कारावास की सजा भुगत रहे ऐसे बंदी जो टीबी या दूसरी असाध्य बीमारियों से पीड़ित हैं भी समय पूर्व रिहाई पा सकेंगे। इसी प्रकार से 70 वर्ष की आयु के 12 से 14 वर्ष सजा काट चुके बंदी और 80 आयु वर्ष के 10 वर्ष की सजा काट चुके बंदी भी समय पूर्व रिहाई के दायरे में आएंगे। इनके अलावा 20 से 25 वर्ष की सजा काट चुके आजीवन कारावास से दंडित बंदियों की समय पूर्व रिहाई की जा सकेगी।
शासन ने समय पूर्व रिहाई की नीति में प्रतिबंधित श्रेणी में ऐसे लोगों को रखा है, जिन्होंने रिहाई के लिए कोई प्रार्थनापत्र नहीं दिया है या जिनके उत्तर प्रदेश से बाहर के किसी न्यायालय ने सजा सुनाई है। जिन मामलों में सीबीआई कोर्ट ने सजा सुनाई है या किसी केंद्रीय कानून के तहत सजायाफ्ता हैं, समय पूर्व रिहाई के दायरे में नहीं आएंगे। सामूहिक नरसंहार (तीन या तीन से अधिक) हत्या करने के दोषी बंदी भी रिहाई के हकदार नहीं होंगे।
पॉक्सो एक्ट के दोषी और आतंकवादी नहीं हो पाएंगे रिहा
शासन द्वारा घोषित समय पूर्व रिहाई की नीति का लाभ आतंकवादी गतिविधियों में दोषी सजायाफ्ता बंदी, पॉक्सो एक्ट के दोषी, ड्रग एंड नारकोटिक्स एक्ट के तहत दोषी, जेल से भागने के दोषी या बेल अथवा पेरोल के दौरान अपराध करने के दोषी, भाड़े पर हत्या करने वाले शूटर, देशद्रोह के अपराधी या एक से अधिक अपराधों में उम्रकैद की सजा पाने वाले अपराधी समय पूर्व रिहाई के हकदार नहीं होंगे।
हाईकोर्ट और एनएचआरसी ने दिया था आदेश
उत्तर प्रदेश में बंदियों की समय पूर्व रिहाई को लेकर कोई नीति न होने पर हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया था। चंद्रासी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में कोर्ट ने 16 अप्रैल 2018 को प्रदेश सरकार को इस संबंध में नीति बनाने का निर्देश दिया था। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी ऐसे आदेश जारी कर चुका है। इसके मद्देनजर कारागार विभाग ने एक समिति गठित की थी। समिति की रिपोर्ट में की गई अनुशंसा के आधार पर एक अगस्त 2018 को शासन ने अपनी नीति घोषित की है।