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बंदी की अपील 20 साल बाद दाखिल करने पर कोर्ट नाराज

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बंदी की अपील 20 साल बाद दाखिल करने से कोर्ट नाराज
0 जेल अधीक्षक बरेली को लगाई फटकार
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद। हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा काट रहे बंदी की सजा के खिलाफ जेल अपील 20 साल बाद हाईकोर्ट भेजने पर गहरी नाराजगी जताई है। जेल अधीक्षक को फटकार लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि अपील दाखिल करने में इस प्रकार की लापरवाही से तो न्याय देने का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। विलंब से अपील दाखिल करने से तमाम औपचारिकताएं बढ़ जाती हैं। कोर्ट ने कहा कि जेल अधीक्षक का वैधानिक दायित्व है कि वह कैदी को अधिकारों की जानकारी दे और समय से सजा के खिलाफ अपील दाखिल कराए। अपील पर न्यायमूर्ति नाहिद आरा मुनीस तथा न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता की खंडपीठ सुनवाई कर रही है।
कोर्ट ने कहा कि जेल अधीक्षक ने जेल अपील पर ठीक से औपचारिकताएं पूरी नहीं की हैं। उन्होंने यह भी नहीं देखा कि कैदी का अंगूठा कहां लगा है। अधीक्षक ने देर से अपील दाखिल करने की माफी अर्जी दी मगर उस पर कैदी का हलफनामा नहीं लगाया। कोर्ट ने जेल अधीक्षक बरेली को कैदी का हलफनामा लेकर कोर्ट में दाखिल करने का निर्देश दिया है। अपील को तीन सप्ताह के तुरंत बाद सुनवाई हेतु पेश करने का आदेश दिया है।
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अपर सत्र न्यायाधीश बिजनौर ने दो फरवरी 1998 को मुकर्रम को हत्या का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। सजा के खिलाफ जेल अपील 60 दिन में दाखिल की जानी थी। लेकिन, 7070 दिन यानी 20 साल देरी से बिना कारण बताए 2018 में बरेली केंद्रीय कारागार अधीक्षक ने सजा के खिलाफ अपील हाईकोर्ट को औपचारिकताएं पूरी किए बिना भेज दी। जिस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई है।
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