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धर्मशाला पर कब्जे के लिए 47 साल चला मुकदमा

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धर्मशाला पर कब्जे के लिए 47 साल चला मुकदमा
0 हाईकोर्ट ने बंटवारे की डिग्री रद्द की, कब्जाधारकों पर 11 लाख रुपये हर्जाना लगाया
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। बांदा रेलवे स्टेशन के पास स्थित लालमन धर्मशाला पर कब्जे के लिए 47 साल तक मुकदमेबाजी करने और धर्मशाला पर कब्जा करने के मामले में हाईकोर्ट ने कब्जेदारों पर 11 लाख रुपये हर्जाना लगाया है। कोर्ट ने धर्मशाला के बंटवारे की 1978 में पारित डिक्री रद्द कर दी है। हर्जाने की राशि वादी मुकदमा लालमन धर्मशाला के उत्तराधिकारीगण अदा करेंगे। इसमें एक से एक लाख रुपये धर्मशाला का रखरखाव करने वाले को और दस लाख रुपये धर्मशाला की देखरेख के लिए दिए जाएंगे। अदालत ने कहा कि यदि धर्मशाला के प्रबंधन के लिए समिति नहीं बनी है तो कोर्ट प्रबंधन की व्यवस्था करेगी ताकि इसकी संपत्ति का दुरुपयोग न किया जा सके।
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विद्यावती और अन्य की अपील को स्वीकार करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति एसपी केसरवानी ने दिया है। प्रकरण के अनुसार लालमन ने आठ जुलाई 1924 को स्टेशन रोड पर एक बीघा 19 बिस्वा भूमि शेख मदज्जामी से 3600 रुपये में खरीदी थी। लालमन की एकमात्र संतान उसकी पुत्री सुखदेई थी। सुखदेई के तीन बेटे रामकृष्ण, माता प्रसाद और भगवान दास हैं। लालमन ने पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे का वाद 1923 में दायर किया और इसी दौरान वसीयत भी की। इसके बाद धर्मशाला के लिए जमीन खरीदी। 40 हजार रुपये में धर्मशाला बनवाई और 30 हजार रुपये इसकी देखरेख के लिए दिए। लालमन की मृत्यु के बाद संपत्ति बंटवारे का वाद खारिज हो गया। इसके खिलाफ अपील दाखिल की गई। अपील न्यायालय ने अपील स्वीकार कर बंटवारे का आदेश दिया, मगर धर्मशाला का बंटवारा नहीं किया गया। इसे संयुक्त संपत्ति करार दिया गया। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल हुई। कोर्ट ने कहा कि धर्मशाला निजी उपयोग के लिए नहीं है। यह धर्मार्थ संपत्ति है।
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