सिर्फ सवा घंटे में ही पार कर ली ‘वैतरणी’
0 भव्य कुंभ देखकर अभिभूत राष्ट्रपति ने कहा, साइबेरियन पक्षियों की भी हो श्रद्धालुओं में गिनती
अनिल सिद्धार्थ
प्रयागराज। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद बृहस्पतिवार को प्रयागराज के कुंभ पर्व का अंग बने तो अभिभूत हो गए। महामहिम संगम की महिमा और कुंभ की दिव्यता कोे देखते, निहारते, मुग्ध और चकित होते रहे। वह गौरवान्वित थे कि देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद के बाद उन्हें भी बतौर राष्ट्रपति कुंभ पर्व में आने का अवसर मिला। परमार्थ निकेतन, हरिजन सेवा संघ, ग्लोबल इंटरफेथ वाश एलायंस के ‘गांधीवाद पुनरुत्थान शिखर सम्मेलन’में आए राष्ट्रपति ने संगम पर सामान्य श्रद्धालु की तरह आस्था से परिवार संग गंगा पूजन किया तो आस्था के जनसमुद्र के बारे में भी जानकारी ली। गंगा पूजन के बाद उन्होंने अक्षयवट का दर्शन भी किया।
परिवार संग क्रूज से यमुना विहार करते हुए यमुना, संगम की लहरों पर साइबेरियन पक्षियों का अठखेलियां करना, एक आवाज पर उनका करीब आना और सेव चुगकर उड़ जाना भी उन्हें इतना भाया कि उन्होंने इन्हें ‘संगम समाज’ से जोड़कर देखा। बोले, यह कितना सुखद है कि यहां स्नान ही नहीं पक्षी भी आते हैं। मकर संक्रांति स्नानपर्व पर दो से सवा दो सौ करोड़ लोगों ने डुबकी लगाई जो सिर्फ इंसानों की संख्या है। अनगिनत संख्या में संगम पर आने वाले साइबेरियन पक्षियों को भी श्रद्धालुओं की सूची में जोड़ा जाना चाहिए क्योंकि यह इन्हीं दिनों आते हैं और फरवरी के अंत या मार्च के दूसरे सप्ताह यानी कुंभ पर्व तक रुककर लौट जाते हैं। यह बात कहीं न कहीं लगती तो है। शायद वह कह नहीं सकते और हम समझ नहीं सकते लेकिन संगम से उनका प्रगाढ़ संबंध है, ऐसे में श्रद्धालुओं में इन पक्षियों की गिनती भी होनी चाहिए।
आस्था में डूबे राष्ट्रपति कोविंद ने सनातन धर्म, संस्कृति, दर्शन से जोड़ते हुए गंगा पार करने के अनुभव को भी साझा किया। कहा, तय कार्यक्रम के मुताबिक संगम के उस पार तीस-चालीस मिनट में कार्यक्रम पूरा करके लौटना था लेकिन यह कुछ लंबा चला। वापसी में गंगा पर बने उसी रास्ते से आना पड़ा जिससे होकर संगम और गंगा पूजन के लिए गए थे। शास्त्रों में मान्यता है कि वैतरणी को पार करने में कई जन्म लग जाते हैं, लेकिन मुझे प्रसन्नता है कि साक्षात मोक्षदायिनी गंगा रूपी वैतरणी पार करने में मुझे सिर्फ सवा घंटे ही लगे। यह वैतरणी से भले ही तुलना न हो लेकिन गंगा को पार करने का भावबोध ऐसा ही है।
कहते हैं, कुंभ पर्व के पहले स्नानपर्व, मकर संक्रांति पर देवी देवता भी यहां स्नान करने को आते हैं। इसी मान्यता के कारण बड़ी संख्या में लोग यहां आए। राष्ट्रपति प्रयागराजवासियों को साधुवाद देना और आतिथ्य के लिए उनकी सराहना करना भी नहीं भूले। कहा, कुंभ पर्व के दौरान शहरियों को जाने कितनी असुविधा होती है, पर सुखद यह है कि वह आतिथ्य भाव में इसे भूल जाते हैं, यह सोचकर कि कुंभपर्व में देश और दुनिया भर से आने वालों के पुण्य में से अप्रत्यक्ष रूप से ही, कुछ हिस्सा उन्हें भी मिल जाता है।