जिले की आबादी में हर साल करीब 60 हजार की बढ़ोत्तरी हो रही है। अगले 10 साल में यहां की आबादी मौजूदा आबादी से 10 लाख अधिक हो जाएगी। आबादी पर नियंत्रण करने के लिए देश में दो बच्चों को कानून लाने की तैयारी है। भले ही यह बुद्धजीवियों के बीच बहस का मुद्दा हो, लेकिन आज के हालातों में ‘हम दो - हमारे दो’ का नारा फिर से बुलंद होने लगा है। ऐसे में सरकार की चिंता भी बेवजह नहीं है।
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जिले की जनसंख्या 36 लाख के पार है। 11 साल में आबादी में और भी बढ़ोत्तरी हो गई है, मगर जिस तेजी से आबादी बढ़ी है, उस हिसाब से संसाधन नहीं बढ़ पाए हैं। जिले में स्वास्थ्य, शिक्षा, विकास, परिवहन, बिजली, पानी, सड़क समेत तमाम मूलभूत सुविधाओं के लिए नागरिकों को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। अभी भी परिवार नियोजन के प्रति गंभीर कदम न उठाए गए तो आने वाला समय गंभीर चुनौतियां लेकर सामने आएगा। इससे निपटने में सरकारी तैयारियां नगण्य ही दिखाई देंगी। जिस अनुपात में जनसंख्या बढ़ रही है, उस अनुपात में लोगों को रोटी, कपड़ा और मकान के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। बेरोजगारी के चलते सरकार को राशन की दुकानों पर मुफ्त में खाद्यान्न बांटना पड़ रहा है और गरीबों के लिए घर बनाने पड़ रहे हैं।
जनसंख्या बढ़ने से भविष्य में शहर के अंदर ट्रैफिक, आवास और रोजगार सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने आएंगे। इसकी वजह से 40 लाख से अधिक जनसंख्या को संभाल पाना आने वाले समय में संभव दिखाई नहीं दे रहा है। शहर का अनियोजित विकास अब समस्या के रूप में सामने आ रहा है। शहर के प्रमुख बाजारों में ट्रैफिक की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। पार्किंग की समस्या के लिए परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त करना ही एकमात्र विकल्प है। शहर की सड़कों पर वर्तमान में 7,95,548 दो पहिया एवं 1,38,871 चार पहिया वाहन दौड़ रहे हैं। हर साल तीस हजार नए वाहन सड़क पर उतरते हैं। अगले दस साल में तीन लाख नए वाहन सड़क पर आने से ट्रैफिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी। शहर में पार्किग की विकराल समस्या को दूर करने की कोशिश फिलहाल होती दिखाई नहीं देती है।
शहर की आकृति कटोरानुमा है और जल निकासी की पुरानी समस्या है। बरसात के दिनों में यह समस्या विकराल रूप धारण कर रही है। बढ़ती आबादी से शहर में यह समस्या और गंभीर होगी, इससे निपटने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
जनसंख्या पर अंकुश लगाने के लिए सरकार का पूरा जोर परिवार नियोजन पर है। महिलाओं ने पहल करते हुए परिवार नियोजन के साधनों जैसे ओरल पिल्स, छाया पिल्स, अंतरा इंजेक्शन, आइयूसीडी, पीपीआइयूसीडी व एनएसवी (नसबंदी) को अपनाया है। शहर के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप बंसल कहते हैं कि जनसंख्या वृद्धि एक सामाजिक समस्या है, जिसे धार्मिक व सांप्रदायिक रूप दे दिया गया है। सरकार की ओर से प्रयास तो खूब हो रहे हैं, मगर संसाधनों का अभाव साफ दिखता है। स्वास्थ्य केंद्रों पर पति - पत्नी और काउंसलर के बीच परिवार नियोजन पर चर्चा होनी चाहिए। जब तक लोग शिक्षित नहीं होंगे, तब तक परिवार नियोजन कार्यक्रम सफल नहीं हो सकता।