मुनीर मेहताब और आशुतोष मिश्रा पश्चिमी यूपी के जरायम गैंग द किलिंग मशीन ए गैंग के रूप में पहचाने गए। सोशल मीडिया पर इन्होंने अपने गैंग का यह नाम रखा हुआ था।
एएमयू में छात्र गुटों की रंगबाजी से आपराधिक पृष्ठभूमि में आए गैंग ने शहर में कारोबारी फहद की हत्या के बाद सुर्खियां बटोरीं। इस हत्या के बाद आशुतोष तो जेल चला गया। मुनीर ने रेलवे मजिस्ट्रेट के गनर, एएमयू छात्र आलमगीर, बरला में अपने दोस्त की हत्या के अलावा एनआईए डीएसपी तंजील अहमद और उनकी पत्नी हत्या की। गिरफ्तारी के बाद अनगिनत अपराध स्वीकारे। आशुतोष-मुनीर के इस गैंग को बिजनौर में पंजीकृत किया गया। जिसमें कुल 15 सदस्य हैं। इसी गैंग का एक साथी सऊद आज तक लापता है। जिस शादाब को बरी किया गया है, वह यहां मुनीर के साथ आलमगीर हत्याकांड में पचास हजार का इनामी रहा था। ब्यूरो
पुलिस से मारपीट में भी नहीं आया गवाह, मुकदमा छूटा
अलीगढ़ सीजेएम न्यायालय से गांधीपार्क पुलिस द्वारा दर्ज कराए गए पुलिस से मारपीट के एक मुकदमे में भी गवाहों के न आने के कारण मुकदमा छूटा है। यह मुकदमा 22 जून 2018 को थाने के प्रशिक्षु दरोगा केशव कुमार वशिष्ठ ने दर्ज कराया था।
इसमें उल्लेख था कि वे रात में दुबे पड़ाव पर दुकान के सामने आग लगने की सूचना पर सिपाही नकुल संग गए थे। वहां इलाके का सौरभ नाम का युवक आया। उसने बेवजह की बातें करते हुए पुलिस के कार्य में बाधा उत्पन्न की व सिपाही से मारपीट कर दी। इस मुकदमे में आरोपी पर पुलिस ने चार्जशीट दायर की। न्यायालय में ट्रायल के लिए कई बार समन, वारंट व एसएसपी को पत्राचार के बाद भी कोई गवाह नहीं पहुंचा। इसके चलते अदालत ने अभियोजन का समय समाप्त करते हुए साक्ष्यों व गवाही के अभाव में आरोपी को बरी कर दिया।