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100 साल में पहली बार तिरंगे को चाहने वालों का इंतजार

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क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम में राष्ट्रीय ध्वज दिखाते हुए स्टोर कर्मी। - फोटो : CITY OFFICE
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आशीष निगम
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अलीगढ़। श्रीगांधी आश्रम के सौ साल के इतिहास में यह पहला मौका है, जब यहां बनने वाले राष्ट्रीय ध्वज की मांग लगभग शून्य है। मार्च से लेकर अभी तक कोई बड़ा या छोटा आर्डर नहीं आया है। सब मायूस और परेशान हैं। सबके मन में एक ही सवाल है कि जिस राष्ट्रीय ध्वज को बनाने, साथ रखने, लहराने, फहराने में हर देशवासी फख्र महसूस करता रहा हो, आज स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उसकी मांग क्यों नहीं है..? जबकि बीते वर्षों में इन दिनों सांस लेने तक की फुर्सत नहीं मिलती थी। हर वर्ष पंद्रह अगस्त के मौके पर कम से कम चार हजार ध्वजों की बिक्री होती है, इस बार अभी तक एक भी ध्वज यहां से नहीं लिया गया है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जब 1920 में अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन को सफल बनाने के लिए पूरे देश का साथ मांग रहे थे। उसी वक्त बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में कार्यरत आचार्य जेबी कृपलानी ने अपनी 250 रुपये महीने की नौकरी को छोड़ा और श्रीगांधी आश्रम की स्थापना कर दी। 30 नवंबर 1920 को श्रीगांधी आश्रम की स्थापना हुई और आज पूरे देश में इसके 47 क्षेत्रीय कार्यालय क्षेत्रीय श्रीगांधी आश्रम के नाम से संचालित हैं। इनमें से एक बन्ना देवी में है।
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गांधी आश्रम से जुड़े लोगों के अनुसार, कम बिक्री कोरोना वारयस का संक्रमण काल, उसके चलते लॉकडाउन, सामूहिक आयोजन नहीं होना, निजी कपड़ों की फर्मों द्वारा तिरंगा बनाना, सस्ते तिरंगे उपलब्ध होना आदि हैं। सरकारी उदासीनता, खादी में कोई छूट न होना, खादी पर भी पांच फीसदी जीएसटी ने भी चरखे की रफ्तार को कम किया। बहरहाल, सात अगस्त तक यहां के क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम में राष्ट्रीय ध्वज का पूरा स्टाक जमा थाए जिसमें चार मानक साइज के ध्वज मौजूद थे। बस नहीं था तो वह, जो इन राष्ट्रीय ध्वजों को साथ ले जाता।
बाराबंकी और फैजाबाद में होती है छपाई : खादी तैयार होने के बाद अलीगढ़ आश्रम आ जाती है और यहां से छपवाई के लिए इसको बाराबंकी और फैजाबाद भेज दिया जाता है। भारत सरकार की ओर से उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ के करीब यही दो जिले हैं जहां खादी ग्रामोद्योग केंद्र के राष्ट्रीय ध्वज सहित अन्य वस्त्रों की छपाई हो सकती है। अन्य किसी के पास इसका अधिकार नहीं है। वहां से छपने के बाद राष्ट्रीय ध्वज अलीगढ़ आते हैं। इतनी लंबी प्रक्रिया अलग अलग स्थानों पर होने से ही ये महंगा भी हो जाता है। खैर, इसके बाद ये सलीके से स्टोरों में सजाए जाते हैं, क्योंकि इस बड़े स्टाक का एक एक राष्ट्रीय ध्वज पूरे हिंदुस्तान की निगहबानी करता है।
अलीगढ़ में बना ध्वज लखनऊ तक लहराता है
क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम बन्ना देवी के प्रबंधक श्रीराम यादव बताते हैं कि जिले में दस स्टोर हैं। जिसमें रेलवे रोड, तस्वीर महल, समद रोड, जवां, खैर, इगलास, अतरौली, जट्टारी, हरदुआगंज, छर्रा शामिल है। इसके अलावा हाथरस जिले में बल्देव में एक स्टोर हैं। मथुरा जिले में वृंदावन, गोवर्धन, छाता मिला कर तीन स्टोर है। एक स्टोर लखनऊ में भी है। इस तरह कुल 15 स्टोर में यहां से राष्ट्रीय ध्वज सहित अन्य खादी वस्त्र की सप्लाई होती है।
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रायबरेली से आती है पूनी, हरदुआगंज बनवाता है खादी
क्षेत्रीय श्रीगांधी आश्रम के मंत्री संतोष मिश्रा कहते हैं कि रायबरेली स्थित खादी ग्रामोद्योग के पूनी प्लांट से पूनी बन कर अलीगढ़ आती है। यहां इसे चरखा कातने वालों को देकर इस पर सूत कतवाया जाता है। इस सूत के धागे को बुनकरों को देकर कपड़ा बनावाने का काम श्रीगांधी आश्रम उत्पत्ति केंद्र हरदुआगंज कराता है यहां के व्यवस्थापक विजय बहादुर पांडेय ने बताया कि 1990 के दशक तक 300 बुनकर थे, अब केवल 20-25 बुनकर ही कपड़ा बुन रहे हैं। यहां से खादी तैयार कर अलीगढ़ भेज दी जाती है।
खादी के राष्ट्रीय ध्वज का साइज और रेट
-1.80 गुणा 1.20 मीटर 600 रुपये
-1.35 गुणा 90 सेंटीमीटर 430 रुपये
-90 सेमी गुणा 60 सेमी 300 रुपये
-70 सेमी गुणा 45 सेमी 200 रुपये
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