कुलपति - कोई पुलिस नहीं रह रही। जो सिक्योरिटी का मामला है, मैं उसे देख लूंगा। देखिए, जो कैंपस में हुआ, मुझे उसका इतना अफसोस है कि आप यकीन नहीं कर सकते हैं। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा होगा। वाकई मुझे अफसोस है। मैं मगरमच्छ के आंसू बहाने यहां नहीं आया हूं। मुझे, मेरी पत्नी, मेरे पूरे परिवार को अफसोस है। जब कभी ऐसी चीजें होती हैं तो आप सोच नहीं सकते कि क्या होगा? मुझे तो पता भी नहीं कि कब मोरिसन हास्टल में कब आफताब में वह लोग गए। मुझे तो पता ही नहीं चला।
(इस पर छात्र दखल देते हुए कहते हैं कि छह घंटे तक आपको पता नहीं चला। फैजुल हसन कहते हैं कि घायलों को लेने आ रही एंबुलेंस को तोड़ा गया, डाक्टरों को पीटा गया। पुलिस को पत्र भी दिया गया)
कुलपति - यह सभी बातें हम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बताएंगे। हमारा वकील बताएगा।
छात्र - 70 बच्चे, जिनको चोट लगी, उनको वहां से भगाया गया
कुलपति - देखिए ऐसा है। किसी को नहीं भगाया। कुछ लड़कों ने खुद ही अपना ट्रीटमेंट कार्ड नहीं बनवाया और वह छोटी मोटी चोट थी। हर लड़के की इंजुरी को मैने खुद मानीटर किया। हर दो घंटे बाद फोन किया। जिसको सर गंगाराम रेफर किया, उसके बारे में खुद वहां के डायरेक्टर मेरी बात हो गई थी। डॉ. निमेष मेहता, बड़े आदमी हैं। जिन्होंने प्रियंका गांधी की डिलीवरी भी कराई थी। मैं कोई अपनी तारीफ नहीं कर रहा, अपनी शेखी नहीं झाड़ रहा। खुद जाकर उन्होंने सीटी स्कैन कराया। दोस्ती है उनसे मेरी। मैंने कहा इसको आप बेस्ट ट्रीटमेंट दीजिए। दो लाख रुपये फौरन ट्रांसफर कराए। 50 हजार रुपये यहां से उसको दिए। किसी के ट्रीटमेंट में कोताही नहीं हुई। अब आप कह रहे हैं कि पिट गए, अब हम कैसे पढ़ें? तो देखिए जेएनयू में भी हूलीगंस (उपद्रवी) नहीं घुस गए। उन्होंने नहीं मारा, दो लड़कों को बंद कर दिया। जब हम स्टूटेंड थे, तब क्या हमारी पिटाई नहीं हुई है। तो क्या पढ़ना छोड़ दें।
(इसके बाद कुलपति प्रस्थान कर जाते हैं। )