एएमयू कुलपति प्रो. तारिक मंसूर ने कहा कि उत्तर भारत में उर्दू को और बढ़ावा देने की जरूरत है। वह शनिवार को उर्दू भाषा संवर्धन परिषद (एनसीपीयूएल) के सहयोग से एएमयू के भाषा विज्ञान विभाग की ओर से आयोजित ‘उर्दू पत्रकारिता: भाषा की बदलती पृष्ठभूमि’ पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करने के बाद बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जीवन में मातृभाषा का बहुत महत्व है, इसलिए उर्दू बोलने वालों को अपनी मातृभाषा के प्रचार और प्रसार पर ध्यान देना चाहिए और अपने बच्चों को घर पर ही उर्दू पढ़ाना चाहिए, क्योंकि नींव बचपन में ही मजबूत होती है।
प्रो. मंसूर ने कहा कि भारत में कुछ भाषाएं और बोलियां हैं, जो खतरे में हैं। ऐसी भाषाओं को संरक्षित करने के लिए शोध और कार्य की आवश्यकता है। भाषा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष व संगोष्ठी निदेशक प्रो. एमजे वारसी ने कहा कि भाषा विज्ञान का संबंध भाषा और अभिव्यक्ति और सभ्यता से भी है। समाचार पत्रों की भाषा के आलोक में भाषाई नवाचार, व्याकरण और व्याकरण संबंधी नियमों की जटिलताओं का आसानी से अध्ययन किया जा सकता है।
स्कूल ऑफ मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी हैदराबाद के डीन प्रो. एहतिशाम ए खान ने कहा कि पत्रकारिता और जनसंचार के छात्र विश्वविद्यालयों और कॉलेज में समाचार और स्क्रिप्ट लेखन तकनीक सीखते हैं, लेकिन भाषा कौशल को सुधारने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया जाता। भाषाविज्ञान विभाग एएमयू के प्रो. एस इम्तियाज हसनैन ने कहा कि प्रतिभागियों के समक्ष मानवीय संबंधों और रिश्तों की जटिलताओं को प्रस्तुत करते हुए कुछ लोकप्रिय धारावाहिकों का भाषाई विश्लेषण प्रस्तुत किया। कला संकाय एएमयू के डीन प्रो. सैयद मोहम्मद हाशिम ने कहा कि उर्दू पत्रकारिता के द्विशताब्दी समारोह का बहुत महत्व है, क्योंकि उर्दू प्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।