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Aligarh: शेखा का कछुआ ‘सिकंदर’ पीढ़ियों से कर रहा झील का पहरेदारी, सबसे पुराने और बड़े कछुओं में है शामिल

Sat, 23 May 2026 01:51 PM IST
Chaman Kumar Sharma आशीष निगम, अमर उजाला, अलीगढ़

सार

सिकंदर बेहद शर्मीला है। अधिकतर समय झाड़ियों और पानी के भीतर छिपा रहता है। भोजन की तलाश में ही बाहर निकलता है। स्थानीय वनकर्मियों के बीच इसे लेकर कई किस्से प्रचलित हैं और इसे शेखा झील का पुराना पहरेदार माना जाता है।
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देखिए अलीगढ़ के वृद्ध कछुए की पहली तस्वीर - फोटो : वन विभाग
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विस्तार
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अलीगढ़ की शेखाझील इन दिनों कछुओं की दुनिया से आबाद है। गर्मी के मौसम में यहां मादा कछुए अंडे देने में जुटी हैं। झील के शांत पानी और झाड़ियों के बीच एक ऐसा कछुआ भी रहता है, जिसे वनकर्मी प्यार से ‘सिकंदर’ पुकारते हैं। झील की देखरेख करने वाले वनकर्मी इश्हाक मोहम्मद पिछले 28 वर्षों से इसे देख रहे हैं। उनका कहना है कि यह झील के सबसे पुराने और बड़े कछुओं में शामिल है।

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इश्हाक बताते हैं कि सिकंदर बेहद शर्मीला है। अधिकतर समय झाड़ियों और पानी के भीतर छिपा रहता है। भोजन की तलाश में ही बाहर निकलता है। स्थानीय वनकर्मियों के बीच इसे लेकर कई किस्से प्रचलित हैं और इसे शेखा झील का पुराना पहरेदार माना जाता है। गर्मी के इस मौसम में झील कछुओं की प्राकृतिक नर्सरी में बदल गई है। मादा कछुए झाड़ियों और किनारों के पास अंडे दे रही हैं। पहली बारिश के बाद इन अंडों से बच्चे बाहर निकलते हैं और धीरे-धीरे पानी की ओर बढ़ते हैं। वन विभाग के अनुसार यह समय इनके लिए सबसे संवेदनशील होता है।

झील के पास से अपर गंग नहर गुजरती है। इसी रास्ते मगरमच्छ भी झील तक पहुंच जाते हैं। वन अधिकारियों के अनुसार मगरमच्छ छोटे और मध्यम आकार के कछुओं का शिकार करते हैं। इससे प्राकृतिक संतुलन बना रहता है। पानी कम होने पर मगरमच्छ वापस नहर की ओर लौट जाते हैं। अलीगढ़ वन विभाग के रेंजर गौरव सिंह बताते हैं कि कछुओं की आधिकारिक गणना अभी नहीं हुई है, लेकिन संरक्षण के चलते इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। अनुमान के अनुसार शेखा झील में इस समय करीब 350 कछुए हैं, जबकि जिलेभर में इनकी संख्या लगभग पांच हजार तक मानी जा रही है।
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विशेषज्ञों के अनुसार कछुए किसी भी जलाशय की जैव विविधता के लिए बेहद अहम होते हैं। यह मृत जलीय जीवों और कार्बनिक पदार्थों को खाकर पानी को साफ रखने में मदद करते हैं। यही वजह है कि इन्हें जलाशयों का प्राकृतिक सफाईकर्मी भी कहा जाता है। रामसर साइट घोषित होने के बाद शेखा झील में निगरानी बढ़ी है। वन विभाग का दावा है कि इससे न केवल प्रवासी पक्षियों बल्कि जलीय जीवों की सुरक्षा भी बेहतर हुई है।

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तीन प्रजातियों का बसेरा
शेखा झील में तीन प्रमुख प्रजातियों के कछुए पाए जाते हैं। इनमें भारतीय फ्लैपशेल कछुआ (लिसेमिस पंक्टाटा), गंगा सॉफ्टशेल कछुआ (निल्सोनिया गैंगेटिका) और काला तालाब कछुआ (जियोक्लेमिस हैमिल्टोनी) शामिल हैं। गंगा सॉफ्टशेल कछुआ आईयूसीएन रेड लिस्ट में लुप्तप्राय श्रेणी में रखा गया है और इसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत उच्च कानूनी सुरक्षा प्राप्त है। काला तालाब कछुआ अपनी चित्तीदार बनावट के कारण आसानी से पहचाना जाता है।

गंगा में छोड़े गए चार हजार कछुए
सांकरा गंगा तट के निकट गांव किरतौली स्थित कछुआ संरक्षण केंद्र से अब तक करीब चार हजार कछुए गंगा में छोड़े जा चुके हैं। इनमें इंडियन टेंट टर्टल, इंडियन सॉफ्टशेल टर्टल और इंडियन रूफ्ड टर्टल प्रजातियां शामिल हैं। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया के सहयोग से संचालित इस केंद्र को नमामि गंगे अभियान से भी जोड़ा गया है। नमामि गंगे से जुड़े ज्ञानेश शर्मा बताते हैं कि स्थानीय जैव विविधता को मजबूत करने के लिए भविष्य में कछुओं की संख्या और बढ़ाने की योजना पर विचार किया जा रहा है। शेखा झील में शांत पानी के नीचे चल रही यह दुनिया केवल कछुओं की कहानी नहीं, बल्कि उस जैव विविधता की पहचान भी है, जिसे बचाए रखना आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

ये भी जानें
  • रामसर साइट में 350 से अधिक कछुए, गर्मी में मादा दे रहीं अंडे
  • झील में तीन प्रजातियों के कछुओं की मौजूदगी
  • मगरमच्छ और कछुओं के सहअस्तित्व से बना जैव संतुलन
  • सांकरा से गंगा में छोड़े गए चार हजार से अधिक कछुए
  • जिले में कछुओं की संख्या पांच हजार के करीब
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