अप्रैल से शुरू होते हैं ऑर्डर
इस कारोबार का सालाना चक्र अप्रैल से शुरू होता है, जब कारोबारी पूरे देश में घूम कर अपने ऑर्डर लेते हैं। जून तक ऑर्डर लेने के बाद जुलाई से माल की आपूर्ति शुरू हो जाती है। दशहरा तक बंदूकों की आपूर्ति भेजी जाती है, जो दिवाली और उसके बाद तक दुकानों में बेची जाती हैं। इधर, कारखानों में रोजाना मशीनों से इनका उत्पादन होता रहता है।
कनस्तर की टिन से हुई थी शुरुआत
बंदूकों को बनाने की शुरुआत लगभग 50 वर्ष पहले पला रोड पर हुई थी। जब खाली कनस्तर के टिन को सपाट कर इसी टिन की बंदूकें बनाई गईं। उसके बाद लोहे की पतली चादरों से इन्हें बनाया गया, फिर प्लास्टिक से इनका निर्माण शुुरू हुआ। इस बीच चीन से भी ऐसी प्लास्टिक की बंदूकें आने लगीं, जिनकी डिजाइन देखकर यहां के उद्यमियों ने सुधार किया। इसके बाद प्लास्टिक और मेटल की बेहतरीन बंदूकें यहां बनना शुरू हो गया।
ईरान-इस्राइल युद्ध के कारण प्लास्टिक का दाना बहुत महंगा हो गया है, जिससे बंदूकों की निर्माण लागत बढ़ गई है। ऑर्डर पहले से अप्रैल-मई और जून में ही ले लिए गए थे, इसलिए उत्पादों की कीमत नहीं बढ़ी है। - मनोज भिलवारा, बंदूक निर्माता। - पूरे देश में बच्चों को पसंद आने वाली छोटी बंदूकों की मांग अधिक होती है। इसलिए सबसे ज्यादा उत्पादन इन्हीं का होता है। इनकी डिजाइन हर साल बदलती है, जिसके लिए नई डाई बनानी पड़ती है। - सुनील पाली, बंदूक निर्माता