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कारोबार: युद्ध की आग में झुलसीं टॉय पिस्टलें, बच्चों का चिर-परिचित खिलौना बनाना अब और हुआ महंगा

Tue, 20 Oct 2026 06:04 PM IST
Chaman Kumar Sharma आशीष निगम, अमर उजाला, अलीगढ़

सार

अलीगढ़ के कारखानों में तीन रुपये से लेकर 800 रुपये तक की बंदूकें बन रही हैं। इसमें प्लास्टिक से बनने वाली बंदूकों की कीमत 3 से लेकर 25 और 30 रुपये तक होती है। जस्ते और लोहे से बनने वाली डिजाइनर पिस्टल और रिवॉल्वर 400 से लेकर 800 रुपये तक की रेंज में है। यह हूबहू असली पिस्टल और रिवॉल्वर जैसी ही दिखती हैं।
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कनवरीगंज स्थित थोक विक्रेता की दुकान में रखी टॉय पिस्टल - फोटो : संवाद
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विस्तार
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इस्राइल-ईरान युद्ध के कारण स्थानीय बंदूक कारोबार बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। दशहरा-दिवाली के मौके पर बच्चों का यह चिर-परिचित खिलौना बनाना अब और महंगा हो गया है, क्योंकि युद्ध के कारण अप्रैल के बाद से पेट्रो केमिकल उत्पादों की कीमतों में लगातार इजाफा हुआ है। इससे प्लास्टिक का दाना 100 से बढ़कर 160 रुपये किलो और एवीएस दाना 140 से बढ़कर 220 रुपये किलो के भाव में पहुंच गया है।

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इसका असर प्लास्टिक की बंदूक बनाने वाले कारोबार पर पड़ रहा है। अलीगढ़ में प्लास्टिक की बंदूकें बनाने वाले छोटे और बड़े 35 कारखाने हैं। यह सभी कारखाने देहलीगेट, सासनीगेट, पला साहिबाबाद रोड, महेंद्र नगर और पुराने शहर में संचालित हैं। इन कारखानों में रोजाना लगभग 60 हजार से अधिक बंदूकें बनती हैं। इनकी आपूर्ति राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्यप्रदेश, कनार्टक, तमिलनाडु, केरलम सहित पूरे देश की जा रही है। कोलकाता के माध्यम से बंगलादेश और तमिलनाडु के जरिये श्रीलंका तक इनका निर्यात भी होता है, जो वहां के कारोबारी करते हैं।

तीन से 800 रुपये तक तक की बंदूकें
अलीगढ़ के कारखानों में तीन रुपये से लेकर 800 रुपये तक की बंदूकें बन रही हैं। इसमें प्लास्टिक से बनने वाली बंदूकों की कीमत 3 से लेकर 25 और 30 रुपये तक होती है। जस्ते और लोहे से बनने वाली डिजाइनर पिस्टल और रिवॉल्वर 400 से लेकर 800 रुपये तक की रेंज में है। यह हूबहू असली पिस्टल और रिवॉल्वर जैसी ही दिखती हैं। अचानक देखने पर कोई भी असली नकली की पहचान नहीं कर सकता है।

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अप्रैल से शुरू होते हैं ऑर्डर
इस कारोबार का सालाना चक्र अप्रैल से शुरू होता है, जब कारोबारी पूरे देश में घूम कर अपने ऑर्डर लेते हैं। जून तक ऑर्डर लेने के बाद जुलाई से माल की आपूर्ति शुरू हो जाती है। दशहरा तक बंदूकों की आपूर्ति भेजी जाती है, जो दिवाली और उसके बाद तक दुकानों में बेची जाती हैं। इधर, कारखानों में रोजाना मशीनों से इनका उत्पादन होता रहता है।

कनस्तर की टिन से हुई थी शुरुआत
बंदूकों को बनाने की शुरुआत लगभग 50 वर्ष पहले पला रोड पर हुई थी। जब खाली कनस्तर के टिन को सपाट कर इसी टिन की बंदूकें बनाई गईं। उसके बाद लोहे की पतली चादरों से इन्हें बनाया गया, फिर प्लास्टिक से इनका निर्माण शुुरू हुआ। इस बीच चीन से भी ऐसी प्लास्टिक की बंदूकें आने लगीं, जिनकी डिजाइन देखकर यहां के उद्यमियों ने सुधार किया। इसके बाद प्लास्टिक और मेटल की बेहतरीन बंदूकें यहां बनना शुरू हो गया।
ईरान-इस्राइल युद्ध के कारण प्लास्टिक का दाना बहुत महंगा हो गया है, जिससे बंदूकों की निर्माण लागत बढ़ गई है। ऑर्डर पहले से अप्रैल-मई और जून में ही ले लिए गए थे, इसलिए उत्पादों की कीमत नहीं बढ़ी है। - मनोज भिलवारा, बंदूक निर्माता। - पूरे देश में बच्चों को पसंद आने वाली छोटी बंदूकों की मांग अधिक होती है। इसलिए सबसे ज्यादा उत्पादन इन्हीं का होता है। इनकी डिजाइन हर साल बदलती है, जिसके लिए नई डाई बनानी पड़ती है। - सुनील पाली, बंदूक निर्माता
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