स्कूली में गर्मी की छुट्टियां यानी नाना-नानी एवं मामा के घर जाने का वक्त, जिसका इंतजार पूरे साल रहता है। न होमवर्क का बोझ और विज्ञान के मॉडल बनाने की चिंता। इस छुट्टी के आते ही मौजमस्ती का दौर शुरू हो जाता था। सबकी डांट-डपट से दूर नाना-नानी के घर जाना और वहां के दोस्तों के साथ खेलों में कब समय बीत जाता कुछ पता ही नहीं चलता। सैर करना बड़ा अच्छा लगता था। लेकिन अब वो चलन कुछ कम हो रहा है।
अब बच्चे नाना-नानी के घर नहीं पर्यटन क्षेत्र में सैर-सपाटा करने एवं धार्मिक स्थलों पर घूमने एवं धार्मिक यात्रा पर जाना पसंद करने लगे हैं। ट्रेनों एवं निजी वाहनों में अग्रिम बुकिंग हो रही है। इसलिए अभी से कुछ प्रमुख ट्रेनों में प्रतीक्षा सूची लंबी हो गई है। ऐसे में लोग ट्रैवल्स एजेंसी के जरिए टैक्सी, कार आदि की बुकिंग करा रहे हैं। लोगों की सबसे पहली पसंद शिमला, हिमाचल प्रदेश के ठंडे शहर हैं। इसके बाद माता वैष्णो देवी, खाटू श्याम, बालाजी, जगन्नाथपुरी, मथुरा-वृंदावन, शिरडी के साईं बाबा, तिरुपति बाला जी, रामेश्वरम आदि धार्मिक स्थल हैं।
बाग से आम तोड़ने का मजा
जिनकी ननिहाल गांव में होती है, वो गर्मी की छुटिटयों में खेतों और बाग का आनंद भी उठाते हैं। पड़ोसी के बगीचे से आम तोड़ने का मजा ही कुछ और था। छुट्टी के समय किताबें पढ़ना अच्छा लगता था।
- पंडित श्यामबाबू शर्मा
बड़ी पारंपरिक होती थीं छुट्टी
70 से 80 के दशक के स्कूल के बच्चों की गर्मी की छुट्टी बड़ी अलग थी। तब न तो सूचना तंत्र इतना मजबूत था और न ही मनोरंजन के लिए टीवी, मोबाइल आदि साधन ही उपलब्ध थे। मिट्टी के घरों में रहने का आनंद और रिश्तेदारों के यहां घूमने का मौका खूब मिलता था। छुट्टी शुरू होते ही रिश्तेदारों की सूची बन जाती थी कि किस-किस रिश्तेदार के यहां पर कितना वक्त बिताना है और किस-किस से मिलना है। तब पुराने घरों में तहखाने होते थे जो ठंडे हुआ करते थे।
- डॉ. रामपाल सिंह
गर्मी छुट्टी होते ही याद आता था मामा का घर
गर्मी की छुट्टी होते ही सबसे पहले मामा का घर याद आता था। गांव में पड़ोसी की दीवार पर चढ़ कर चुपके से आम और अमरूद तोड़ना भी बड़ा अच्छा लगता था। बागों में खेले जाने वाले खेल काफी प्रिय होते थे। इसके अलावा शारीरिक व्यायाम और विभिन्न तरह के खेल पसंद थे।
-उमेश पाठक, एडवोकेट
बदल गई हैं पुरानी परंपराएं
आज लोग इतने व्यस्त हो गए हैं कि वे बच्चों की गर्मी की छुट्टी अपने हिसाब से तय करते हैं। गांवों में छुट्टी बिताना पसंद न कर किसी हिल स्टेशन या ठंडे प्रदेश की सैर करना अच्छा समझते हैं। पहले लोग रिश्तेदारों के यहां गर्मी की छुट्टी होते ही पहुंच जाया करते थे। आज ये परंपरा बदली है।
- सतपाल सुमन