नोटबंदी की बड़ी मार आलू किसानों पर पड़ी है। शीतगृह में जिन किसानों का आलू रखा रह गया था वह कौड़ी के भाव हो गया है। व्यापारी तो प्रति बोरा 500-600 रुपये तक बेच रहे हैं लेकिन नोटबंदी के पहले जहां 700 रुपये बोरे का भाव था वहीं अब व्यापारी किसानों से 200-250 रुपये बोरे में ही खरीद कर रहे हैं।
इतना ही नहीं शीतगृह संचालकों की ओर से भी किसानों से आलू उठाने का दबाव डाला जा रहा है ऐसे में किसानों के सामने अपना आलू बेचकर शीतगृह का किराया निकालने तक की दुश्वारियां आ गई हैं।
क्षेत्र में 10 से 12 प्रतिशत आलू महंगाई की उम्मीद में किसानों ने शीतगृहों में ही बचा रखा था। शीतगृह संचालक एसोसिएशन के अध्यक्ष जीके माहेश्वरी के अनुसार किर्री व गुल्ला साइज आलू व्यापारी नहीं खरीद रहे। मोटा आलू भी दो से ढाई सौ रुपये बोरा ही खरीद हो रही है। भुगतान में भी नई करेंसी की समस्या बनी हुई है।
प्रगतिशील किसान पुष्पकांत शर्मा के अनुसार आलू की फसल में प्रति बीघा 14 से 15 हजार रुपये तक लागत आती है। एक बीघा में औसतन पचास बोरा तक आलू पैदा होता है। इस तरह दो सौ अस्सी रुपये प्रति बोरी उत्पादन लागत आती है। इससे भी कम दाम पर आलू बिका तो किसान का बर्बाद होना तय है। किसान चौधरी गंभीर सिंह के मुताबिक 8 नवंबर से पहले मोटे आलू के दाम 700-800 रुपये चल रहे थे। अब भाव गिर गया है।