मानसून से पहले की बूंदाबांदी ने शहर के उफनते नालों की तस्वीर दिखा दी है। ऐसे में यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या यह शहर मानसून की तेज बारिश और उसके बाद होने वाले जलभराव के हालात से निपटने के लिए तैयार है?
सोमवार को हुई बारिश से कई इलाकों में जलभराव हो गया। शहर में आलम ये है कि करीब-करीब चोक पड़े नाले, उनमें भरी पड़ी पॉलीथिन, प्लास्टिक के कप, कूड़ा, मलवा आदि पानी को एक इंच भी आगे नहीं सरका रहा है। इसके अलावा शहर के करीब 84 किलोमीटर लंबाई के नालों को आपस में जोड़ने की योजना भी पूरी नहीं हो सकी है।
नालों पर पक्के स्लैब डाल लिए गए हैं। जिससे पौक लैंड मशीन और जेसीबी पूरे नाले को खंगाल नहीं पाती हैं। साथ ही नाले के किनारे वाले दुकानदार और भवन स्वामी भी चाहते हैं कि उनका स्लैब न तोड़ा जाए।
अधिकांश दुकानदार, भवन स्वामी, कामर्शियल कांप्लेक्स वाले, नालों को कूड़ेदान की तरह इस्तेमाल करते हैं। पालीथिन, मलवा, दोना-पत्ते, सारा कूड़ा आदि नालों में डालते हैं। जिससे भी नाले चोक हो जाते हैं।
गांधी पार्क बस स्टैंड पर शाहकमाल रोड पर मंदिर के पीछे नाले पर स्लैब डाल कर कब्जा करने की कोशिश की जा रही है। एसपी सिटी कार्यालय के सामने रेलवे की वाउंड्री के पास, दुबे के पड़ाव पर नाले को ब्लाक किया गया है। वहीं सोमवार को स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर दो और रेलवे कालोनी में जलभराव से हालात बदतर हो गए।
नाले के ब्लाकेज खोलने और फ्लो क्लीयर करने के लिए पूरी कोशिश की जा रही है। लोगों से भी अपील है कि वह नाले और नालियों में कूड़ा आदि न डालें। होता यह है कि हम सफाई करते हैं और उसके बाद नाले में कूड़ा डालना शुरू कर दिया जाता है। सुबह झाड़ू के बदा कूड़ा नाली में ही डाला जाता है। पोखरों की जल संचयन क्षमता बढ़ाई गई है। उनकी खुदाई कराई गई है। पूरी कोशिश होगी कि मानसून के दौरान शहर को जलभराव से ज्यादा दिक्कत नहीं हो। - संतोष कुमार शर्मा, नगर आयुक्त