वृद्धाश्रम में बुजुर्ग
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आश्रम की कहानियां झकझोर देने वाली हैं। गाजियाबाद के रहने वाले अर्जुन अग्रवाल पिछले एक महीने से यहां रह रहे हैं। उनके दो बेटे और दो बहुएं हैं। बेटे अच्छा व्यापार करते हैं, एक बहू सरकारी टीचर है और दूसरी कोचिंग चलाती है। सब कुछ संपन्न होने के बाद भी बहुओं से अनबन के कारण उन्हें इस उम्र में अपना घर छोड़ना पड़ा। वहीं, अलीगढ़ के राधेश्याम अग्रवाल का भी यही दर्द है। बेटे का अच्छा-खासा व्यापार है, लेकिन बहू से हुए विवाद के चलते वे एक साल से आश्रम में रहने को मजबूर हैं।
बच्चों की बेरुखी ने छीना घर का सुकूं
रेलवे में नौकरी करने वाले बेटे के पिता भूप सिंह पिछले दो साल से वृद्धाश्रम रह रहे हैं। उनका बेटा-बहू दिल्ली में रहते हैं, लेकिन पिता के लिए उनके पास वक्त नहीं है। अलीगढ़ के ही विजय कुमार अपनी पत्नी मधु के साथ पिछले चार साल से आश्रम में रह रहे हैं। उनका एक बेटा और चार बेटियां हैं। बेटा बेरोजगार है और परिस्थितियों व अपनों की बेरुखी के चलते इस बुजुर्ग दंपति को अपना आशियाना छोड़ना पड़ा।
छर्रा आवासीय वृद्ध आश्रम में मौजूद वृद्धजन
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कयामपुर मोड़ पर वृद्ध आश्रम में रहने वालीं नजमा, मालकुमारी, यशोदा, शांति, मीरा, शकुंतला देवी, पूर्णिमा सेठ, हरी प्रसाद, भूषण कुमार, बहोरी लाल, गिर्राज किशोर, राजकुमारी और अनीता देवी जैसे कई बुजुर्गों की सूनी आंखें आज भी आश्रम के मुख्य दरवाजे को निहारती रहती हैं। इन्हें आज भी उम्मीद है कि शायद कोई अपना आएगा और गले से लगाकर कहेगा चलो घर चलें।
बरौला के जय सिया राम वृद्धाश्राम में हैं 35 बुजुर्ग
आश्रम की अध्यक्ष सुनीता शर्मा कहती हैं कि 2011 में शुरू किए इस आश्रम में अब 35 बुजुर्ग हैं। इनकी देखभाल संस्था की कमेटी कर रही है। वह कहती हैं कि यह दिन हमें सोचने पर मजबूर करता है कि जो माता-पिता बच्चों को चलना सिखाते हैं, बच्चे बड़े होकर उन्हें इस तरह बेसहारा कैसे छोड़ देते हैं।