सामान्य रूप में जमीन से मिलने वाला अर्थ (एक तरह का करंट सिस्टम) रेग्यूलेटर की तर्ज पर काम करता है। अगर वोल्टेज बढ़ जाए तो अतिरिक्त वोल्टेज जमीन में समा जाता है और यदि वोल्टेज कम हो तो यही अर्थ वोल्टेज बढ़ा देता है।
ये सिस्टम जमीन में औसतन पांच से छह फीट गहराई तक लगाया जाता है। इससे उल्ट धरती की कोख में 10 से 30 फीट तक की गहराई में होने वाले कंपनों को रेडियो फ्रीक्वेंसी सिग्नल देकर बढ़ा दिया जाये तो इससे बाकायदा बिजली पैदा हो सकती है। डीएस कॉलेज के रिटायर भौतिक विज्ञानी और सिंघानिया यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति प्रो.आर स्वरूप ने दो दशक की कड़ी मेहनत के बाद अपने क्रियाशील मॉडल से इसेे सिद्ध किया है। अब दुनिया भर में उनके मॉडल पर बहस छिड़ी हुई है।
प्रो. स्वरूप ने स्वर्णजयंती नगर के अपने मकान एमएस-32 में जमीन के 10 फीट अंदर एक रॉड डाली। इस राड ने जमीन के अंदर महसूस किये गये कंपनों को मीटर में दर्ज कराया। इस कंपन में पैदा हुई ध्वनि तरंग को विद्युतीय उर्जा में बदला गया तो माइक्रो एंपियर करंट, मिनी वोल्ट और नैनो वॉट पावर मिला।
रेडियो फ्रीक्वेंसी सिग्नल इस्तेमाल कर करंट की मात्र को बढ़ाया जा सकता है। प्रो.स्वरूप ने बताया कि इससे जमीन में होने वाले कंपनों से बिजली पैदा होगी। इन कंपनों का प्रयोग होने से भूकंप की संभावनाओं को कम किया जा सकता है। भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में इस तरह के बड़े मॉडल लगा कर विनाशकारी ऊर्जा को विकासकारी ऊर्जा में बदला जा सकता है। जमीन के अंदर होने वाली प्राकृतिक रेडियो एक्टिविटी को भी सकारात्मक ऊर्जा में बदल सकते हैं।
प्रो. स्वरूप ने बताया कि राष्ट्रपति सचिवालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, रक्षा मंत्रालय, यूएनओ, यूनेस्को, यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका, डब्ल्यूएचओ और देश के प्रतिष्ठित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जिओलॉजी देहरादून को यह मॉडल भेजा गया है। वाडिया इंस्टीट्यूट के चेयरमैन सुनील कुमार रोहेला ने इस संबंध में सकारात्मक जवाब दिए हैं। अब हरियाणा के सोनीपत में भारत इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने उन्हें अपने यहां इस मॉडल पर काम करने का न्यौता दिया है।
प्रो. स्वरूप इस मॉडल का पेटेंट कराने के लिए डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी नई दिल्ली की विंग टेक्नोलॉजी इंफारमेशन एंड फोरकास्टिंग कौंसिल के संपर्क में हैं। वह पेटेंट से होने वाली कमाई से एक ऐसा विश्वविद्यालय बनाना चाहते हैं जहां छात्रों को विश्वस्तरीय उच्च शिक्षा नि:शुल्क मिले और वहां के शोध कार्यों से विश्वविद्यालय अपना खर्च चलाए। वर्तमान में वह पेड़ों की जड़ों में रेडियो फ्रीक्वेंसी सिग्नल देकर ऑक्सीजन उत्पादन बढ़ाने पर काम कर रहे हैं ताकि वातावरण में ऑक्सीजन बढ़े तो पर्यावरण संरक्षण, जरूरत के अनुसार बारिश और ओजोन पर्त का संरक्षण हो सके।
आध्यात्म से विज्ञान तक
1946 में एटा के बनगांव में श्रीछेदाराम और महारानी देवी के परिवार में जन्मे प्रो.स्वरूप किशोरावस्था में आरएसएस और आध्यात्म से बेहद करीब रहे। बाद में विज्ञान की ओर मुड़ गए। सन् 1968 में आगरा के सेंट जोंस से भौतिक विज्ञान में एमएससी पूरा हुआ तो वहां मिल रही अस्थायी शिक्षक की नौकरी ठुकरा दी और डीएस कालेज में स्थायी लेक्चरर बन गए।
आध्यात्म और विज्ञान से जमीन और ब्रह्मांड तक तरंगों की कहानी समझी तो अविष्कार में जुट गये। 2008 में रिटायर हुए तो 2010 में सिंघानिया यूनिवर्सिटी में कुलपति बने। गरीबों को नि:शुल्क शिक्षा देने की शर्तें पूरी नहीं होने पर उन्हाेंने कुलपति पद छोड़ दिया।
और अब 90 के दशक से जारी शोध कार्यों को जमीन पर उतारने के काम में जुटे हैं। प्रो. कहते हैं, उन्होंने कभी ट्यूशन नहीं पढ़ाई। हमेशा छात्रों की मदद की। उन्हें वैज्ञानिक बनने को प्रेरित किया। आज देश विदेश में उनके कई शिष्य नाम रोशन कर रहे हैं। यही उनकी असली कमाई है।