29 अगस्त को हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जयंती राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाई जाती है। खेल मैदान खिलाड़ियों और प्रशंसकों से भरे रहते थे। लेकिन इस बार नजारा कुछ बदला-बदला सा रहेगा। कोई बड़ी प्रतियोगिता नहीं होगी। कार्यक्रम भी होंगे तो सिर्फ रस्मअदायगी भर होंगे। क्योंकि कोरोना काल में खेलकूद की सभी गतिविधियां ठप हो गईं। खिलाड़ियों के गुजरे पांच महीने बर्बाद हो गए, खेलकूद की गतिविधियां ठप हो गईं। जैसे-तैसे खिलाड़ी खुद की फिटनेस बरकरार रख रहे हैं। इसके लिए वह अपने घरों व छतों पर व्यायाम कर रहे हैं, जो नाकाफी है।
महारानी अहिल्याबाई होल्कर स्पोर्ट्स स्टेडियम में पिछले साल नौ खेलों के कैंप लगे थे। एक अप्रैल से नया सत्र शुरू होना था, लेकिन कोरोना ने खिलाड़ियों व अंशकालिक प्रशिक्षकों की तैयारियों पर पानी फेर दिया। स्टेडियम में भारोत्तोलन, हॉकी, क्रिकेट, कुश्ती, शूटिंग, बॉक्सिंग, एथलेटिक्स के कैंप थे। कैंप में खिलाड़ियों को प्रशिक्षक प्रशिक्षित कर रहे थे, जबकि टेनिस के विशेषज्ञ क्रीड़ाधिकारी अनिल कुमार व टेबल टेनिस के विशेषज्ञ उप क्रीड़ाधिकारी विजय सिंह हैं।
तिल-तिल कर मर रही हूं : मीनाक्षी
स्टेडियम में भारोत्तोलन की अंशकालिक प्रशिक्षक मीनाक्षी गौड़ ने कहा कि जब से कोरोना संकट पैदा हुआ है, तब से आमदनी का जरिया बंद हो गया। इधर-उधर से मांगकर गुजर-बसर चल रहा है। मीनाक्षी ने बताया कि उनके पति का निधन वर्ष 2011 में हो गया था। दो बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उन पर आ गई थी। वर्ष 2015 में वह स्टेडियम में अंशकालिक प्रशिक्षक बन गईं। स्टेडियम से मिलने वाली धनराशि से परिवार का गुजर-बसर अच्छी तरह से हो रहा था, लेकिन मार्च से उनकी जिंदगी नरक बन गई है। तीन महीने से मकान का किराया, बिजली का बिल नहीं दे पाई हैं। स्कूल से बच्चों की फीस जमा करने के बराबर मोबाइल पर संदेश आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सगे-संबंधियों से पैसे मांगकर बच्चों व खुद का पेट पाल रही हूं। थक हारकर उन्होंने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, खेल मंत्री को पत्र भेजकर आर्थिक मदद की गुुहार लगाई है। कमोवेश यही स्थिति बाकी प्रशिक्षकों की भी है। कुरेदने पर उनका गला रुंध जाता है।
गुमनामी में खोए अपने जमाने के चर्चित खिलाड़ी
अपने जमाने में चर्चित खिलाड़ियों में शुमार राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी मोहम्मद शैदा व राष्ट्रीय धावक हीरा सिंह को आज की युुवा पीढ़ी नहीं जानती, लेकिन उन्होंने अपने खेल से शहर का नाम रोशन किया है। खेल दिवस पर गुमनामी में खोए इन खिलाड़ियों के बारे में जानकारी दे रहे हैं।
बदकिस्मती से शैदा नहीं पहन पाए नीली जर्सी
सत्तर के दशक में मोहम्मद शैदा एक शानदार हॉकी खिलाड़ी बनकर उभरे थे। मेहनत व चपलता से विपक्षी टीम की रक्षापंक्ति को छिन्न-भिन्न करने वाले सेंटर फॉरवर्ड खिलाड़ी मोहम्मद शैदा को आज के युवा खिलाड़ी जानते-पहचानते नहीं हैं। एक वक्त वो था, जब शैदा गेंद लेकर आगे बढ़ते थे तब मैदान पर शैदा-शैदा का शोर मचने लगता था। वर्ष 1975 में शैदा ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की हॉकी टीम की कप्तानी की।
वर्ष 1977 में उत्तर प्रदेश हॉकी टीम के कप्तान बने। छह बार उन्होंने राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता में प्रतिनिधित्व किया। 1976 व 1977 में भारतीय हॉकी टीम में शामिल होने के लिए कैंप भी किया। मगर टीम चुने जाने से पहले उनके दाहिने पैर में फैक्चर हो गया, जिससे वह टीम में न चुने जा सके। शैदा का नीली जर्सी पहनने का ख्वाब अधूरा रह गया। शैदा ने वर्ष 1974 में सीनियर नेहरू एकादश से स्पेन के खिलाफ मैच खेला था। साल 1972 से 1978 तक हॉकी में शैदा का प्रदर्शन चरम पर था। खेल कोटे से शैदा की विद्युत विभाग उप्र में नौकरी लग गई, जो लखनऊ से अधिशाषी अभियंता के पद से वर्ष 2010 में सेवानिवृत्त हुए। सागर कांप्लेक्स अनूपशहर रोड निवासी मोहम्मद शैदा ने कहा कि हॉकी ने उन्हें बहुत कुछ दिया है। बेटे का हॉकी में रुझान में नहीं था, इसलिए उसने हॉकी स्टिक नहीं पकड़ी।
इंडिया पुलिस मैराथन में हीरा ने जीता कांस्य पदक
देवी नगला निवासी क्वार्सी निवासी हीरा सिंह ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की तरफ से खेलते हुए वर्ष 1994 में ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी के पांच किलोमीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता था। इसके बाद उनकी खेल कोटे से सीमा सुरक्षा बल में नौकरी लग गई। हीरा ने इंडिया पुलिस खेलकूद प्रतियोगिता में बीएसएफ के लिए हाफ मैराथन में कांस्य पदक जीता। कई बार राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी शामिल हुए। यह बात अलग है कि उन्हें मेडल नहीं मिला। यूनाइटेड नेशन की तरफ से उन्होंने हैती में सेवाएं दीं। वह वर्ष 1998 में सेवानिवृत्त हो गए। हीरा ने बताया कि सेवानिवृत्त होने के बाद स्टेडियम में अंशकालिक कोच हो गए। इस समय वह वेटरंस इंडिया स्पोर्ट्स विंग के संयुक्त सचिव व स्पोर्ट्स इंचार्ज उत्तर प्रदेश हैं। उन्होंने कहा कि भारत की तरफ से खेलने का उनका सपना अधूरा रह गया, लेकिन अब वह खिलाड़ियों को तैयार कर रहे हैं, जो भारत का प्रतिनिधित्व कर उनका अधूरा सपना पूरा करेंगे।