फ्लाई ओवर के लिए पिलर लगाने को मांगी थी जमीन
इस जमीन का प्रकरण मार्च 2023 में तब चर्चा में आया जब प्रशासन ने सरकारी जमीनों का चिह्नांकन शुरू किया। नगला पटवारी से पुरानी चुंगी तक बनने वाले फ्लाईओवर के पिलर लगाने के लिए जब एएमयू से अनुमति मांगी गई, तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपनी जमीन बताते हुए इनकार कर दिया। इसके बाद जब राजस्व विभाग ने जांच की, तो पता चला कि खतौनी में एएमयू का नाम ही दर्ज नहीं है और यह संपत्ति नगर निगम की है। इसके बाद एसडीएम कोल और नगर निगम की टीम ने मौके पर पहुंचकर निगम का बोर्ड लगा दिया था। उस समय प्रशासन का दावा था कि एएमयू मालिकाना हक से जुड़ा कोई पुख्ता दस्तावेज पेश नहीं कर सका जबकि एएमयू का तर्क था कि यह जमीन भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के तहत विधिवत प्राप्त की गई थी और बिना किसी पूर्व नोटिस के कार्रवाई की गई। अब एसआईटी जांच के माध्यम से यह स्पष्ट किया जाएगा कि दशकों तक सरकारी जमीन पर कब्जा कैसे रहा और इसमें किन अधिकारियों की लापरवाही रही।
एएमयू प्रशासन पर छात्र नेताओं ने लगाए थे आरोप
एएमयू के कब्जे वाली जमीन के अचानक जिला प्रशासन के कब्जे में चले जाने पर उस समय छात्र नेताओं और पूर्व छात्रों ने एएमयू प्रशासन की भूमिका को सवालों के घेरे में रखा। एएमयू प्रशासन पर आरोप लगाए थे कि वह अपनी संपत्ति का सही से रखरखाव और पैरोकारी नहीं कर सका। सही समय पर संपत्ति के दस्तावेज प्रशासनिक विवरण में दर्ज कराने थे, जो एएमयू नहीं कर सका। उस समय एएमयू प्रशासन ने कहा था कि हम अपना पक्ष अदालत में रखेंगे। शासन के समक्ष अपनी बात रखेंगे। इसके बाद एएमयू प्रशासन ने अदालत और शासन के समक्ष मामले की पैरोकारी की। जिसके बाद अब एसआईटी जांच हो रही है।