डॉ.राहत अबरार ने बताया कि तालीम के लिए चंदा जुटाने के लिए सर सैयद ने स्वयं पैरों में घुंघरू बांधकर लोगों से आर्थिक सहायता मांगी। उस दौर में यह केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने वाला साहसिक संदेश था।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक सर सैयद अहमद खान को तालीम के लिए न सिर्फ अपने पैरों में घुंघरू बांधने पड़े थे, बल्कि नृत्य तक करना पड़ा था। इस कार्यक्रम से उन्होंने 200 रुपये चंदा भी बटोरा था, जिसे मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज में लगा दिया। छह फरवरी 1893 को नुमाइश में इस नाटक का मंचन किया गया था।
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एएमयू के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी डॉ.राहत अबरार ने बताया कि तालीम के लिए चंदा जुटाने के लिए सर सैयद ने स्वयं पैरों में घुंघरू बांधकर लोगों से आर्थिक सहायता मांगी। उस दौर में यह केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने वाला साहसिक संदेश था। डॉ. राहत ने कहा कि वर्ष 1884 में अमृतसर और वहां के थिएटर की रचनात्मक गतिविधियों से प्रेरित होकर सर सैयद ने एक नाटक की तैयारी शुरू की, जिसका उस समय विरोध भी हुआ।
बाद में उर्दू के विद्वान अल्लामा शिबली नोमानी ने इस नाटक के लिए विशेष नज्म लिखी और स्वयं सुनाई। अफगानिस्तान से आए आगा मोहम्मद हुसैन ने अफगानी लिबास में पश्तो गीत गाया। दत्तावली के नवाब इस्माइल खान ने भी लोगों के आग्रह पर पैरों में घुंघरू बांधकर चंदा मांगा था। नुमाइश में पेश किया गया यह नाटक इतिहास में अमर हो गया।