हर मौके पर एक ही जवाब, धारा लागू
होली, रमजान, परीक्षाएं, स्वतंत्रता दिवस, क्रिसमस मौका कोई भी हो, प्रशासन का पहला कदम निषेधाज्ञा लागू करना ही बन गया है। इससे सवाल उठ रहा है कि क्या हर आयोजन को संभावित खतरे के रूप में ही देखा जा रहा है? एक समय था जब हालात के चलते पूरे साल निषेधाज्ञा लागू रहती थी। लेकिन अब जबकि शहर में बड़े सांप्रदायिक तनाव के मामले कम हुए हैं, फिर भी परंपरा नहीं बदली। 2024 और 2025 में करीब पांच-पांच महीने तक पाबंदियां लागू रहीं। 2026 में भी 20 फरवरी से 30 अप्रैल तक 69 दिन की निषेधाज्ञा जारी है।
टारगेटेड एक्शन ज्यादा असरदार: अधिकारी
अलीगढ़ मंडल के अधिकारी मानते हैं कि इंटेलिजेंस आधारित टारगेटेड कार्रवाई, संवेदनशील इलाकों में सीमित पाबंदियां, कम्युनिटी पुलिसिंग और संवाद जैसे विकल्प अपनाकर पूरे शहर को लंबे समय तक प्रतिबंधों में रखने से बचा जा सकता है।
आम जिंदगी पर असर
स्थानीय स्तर पर बड़े सांप्रदायिक तनाव के मामले अब पहले की तुलना में कम सामने आते हैं। सामाजिक और धार्मिक आयोजन भी अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण तरीके से हो रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या पूरे शहर पर एक समान पाबंदी जरूरी है? निषेधाज्ञा का मतलब भले ही पूर्ण प्रतिबंध नहीं होता, लेकिन इसका असर शहर की रोजमर्रा की गतिविधियों पर साफ दिखता है। उदाहरण के तौर पर छोटे आयोजनों के लिए भी अनुमति जरूरी होना, सामाजिक व छात्र गतिविधियों पर दबाव और हर समय निगरानी का माहौल होना है। कुल मिलाकर अलीगढ़ के हालात बदले हैं, लेकिन निषेधाज्ञा लगाने का तरीका नहीं। अब देखना यह है कि शहर को कब तक एहतियात और आदत के बीच संतुलन का इंतजार करना पड़ेगा।